ईरान युद्ध के चलते खाड़ी देशों से आने वाले पैसे पर संकट
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

खाड़ी देशों में दक्षिण एशिया के लाखों मजदूर काम करते हैं और अपने घर पैसे भेजकर अपने देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाते हैं. लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचता है खाड़ी देशों से आने वाले इस पैसे पर भी संकट आ सकता है.ईरान युद्ध की वजह से दक्षिण एशियाई देशों में सिर्फ गैस और तेल का ही संकट नहीं हो रहा है, बल्कि वहां की अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर हो सकता है. जब ईरान के ड्रोन और मिसाइलें खाड़ी के अमीर अरब देशों को निशाना बना रही हैं, तो युद्ध की वजह से होने वाली और लंबे समय तक चलने वाली आर्थिक उथल-पुथल दक्षिण एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकती है. इसकी वजह यह है कि यहां लाखों दक्षिण एशियाई विदेशी मजदूर काम करते हैं और हर साल अरबों डॉलर अपने घर भेजते हैं. इस युद्ध के कारण उनके इस पैसे पर संकट आ सकता है.

इनमें से ज्यादातर कामगार भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आते हैं. पिछले कई दशकों से उन्होंने खाड़ी देशों की तरक्की में बड़ी भूमिका निभाई है. उन्होंने निर्माण, होटल, पर्यटन और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे क्षेत्रों में काम करके वहां की अर्थव्यवस्था को तेजी से आगे बढ़ाया है.

इन मजदूरों द्वारा भेजा गया पैसा (रेमिटेंस) न केवल उनके परिवारों के लिए गुजारे का साधन होता है, बल्कि यह भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लिए विदेशी मुद्रा का एक बहुत बड़ा स्रोत भी है. यह पैसा इन देशों की अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करता है और व्यापार घाटे को भरने में मदद करता है.

चूंकि ऊर्जा के बुनियादी ढांचों, जैसे कि रिफाइनरी और पाइपलाइन पर हमले हो रहे हैं और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तेल-गैस का रास्ता बंद है, तो यह स्थिति भारत और उसके पड़ोसियों के लिए दोहरी मुसीबत बन सकती है. एक तरफ लंबे समय तक ईंधन (पेट्रोल-डीजल) के दाम आसमान छुएंगे और दूसरी तरफ खाड़ी से घर आने वाले पैसे में भी भारी कमी आ सकती है.

भारत जैसे देशों के लिए मायने रखता है यह पैसा

भारत दुनिया में सबसे ज्यादा रेमिटेंस पाने वाला देश है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 में भारत में रिकॉर्ड 135 अरब डॉलर बाहर से आए हैं. पिछले साल भारत को सिर्फ खाड़ी देशों यानी गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) से ही लगभग 40 अरब डॉलर का रेमिटेंस मिला, जो भारत में आने वाले कुल विदेशी पैसे का करीब 38 फीसदी हिस्सा है. सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि इन अरबों डॉलर ने देश के व्यापार घाटे के एक बड़े हिस्से की भरपाई करने में बहुत मदद की है.

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खाड़ी के देशों में सबसे ज्यादा विदेशी मजदूर भारत से आते हैं. वहां करीब 90 लाख भारतीय रह रहे हैं और काम कर रहे हैं. इसके बाद बांग्लादेश और पाकिस्तान का नंबर आता है, जिनके लगभग 50-50 लाख मजदूर इन देशों (जीसीसी) में हैं. पिछले साल बांग्लादेश को जो 30 अरब डॉलर और पाकिस्तान को जो 38 अरब डॉलर का विदेशी पैसा मिला, उसका एक बड़ा हिस्सा इन्हीं मजदूरों ने भेजा था.

खाड़ी देशों में प्रवासी मजदूरों के लिए खतरा

इस युद्ध ने खाड़ी देशों में रहने वाले आम लोगों की जान को भारी खतरे में डाल दिया है. इनमें वहां काम करने वाले प्रवासी मजदूर भी शामिल हैं. अब वहां सुरक्षा का जोखिम पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है. ह्यूमन राइट्स वॉच (एचआरडब्ल्यू) ने 17 मार्च को एक रिपोर्ट जारी की है. इसमें बताया गया है कि पूरे इलाके में अब तक कम से कम 11 आम नागरिक मारे जा चुके हैं और 260 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं. इनमें से कुछ मौतें आसमान से गिरने वाले मलबे (मिसाइल या ड्रोन के टुकड़ों) की वजह से हुई हैं.

ह्यूमन राइट्स वॉच में सऊदी अरब और यूएई की सीनियर रिसर्चर जोई शेया ने कहा, "सभी खाड़ी देशों में आम नागरिक और खास तौर पर वहां काम करने वाले प्रवासी मजदूर, ईरानी ड्रोन और मिसाइलों के निशाने पर हैं. उन्हें धमकियां मिल रही हैं, वे मारे जा रहे हैं और बुरी तरह घायल हो रहे हैं.” यूएई में कम से कम तीन पाकिस्तानी मजदूर मारे गए, जिनमें एक ऐसा व्यक्ति भी शामिल था जो ड्रोन हमले के बाद गिरे मलबे की चपेट में आ गया था. खतरा होने के बावजूद, खाड़ी देशों में रहने वाले ज्यादातर दक्षिण एशियाई प्रवासी वहीं रुके हुए दिख रहे हैं. बड़े पैमाने पर लोगों के पलायन की कोई रिपोर्ट नहीं मिली है.

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नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक ‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन' (ओआरएफ) में स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम के प्रमुख हर्ष पंत ने डीडब्ल्यू को बताया, "ज्यादातर मजदूरों के लिए पेट पालना जान के खतरे से कहीं बड़ी बात है.” उन्होंने कहा कि खाड़ी में रहने वाले ज्यादातर भारतीय मजदूर मौजूदा स्थिति को ‘अस्थायी और काबू में' मान रहे हैं. उनका सोचना है कि जब तक हालात बहुत ज्यादा नहीं बिगड़ते या युद्ध बड़े पैमाने पर नहीं फैलता, तब तक वहां रुककर काम किया जा सकता है.

भले ही मजदूर वहां रुक जाएं, लेकिन बड़ा खतरा यह है कि लंबे समय में शायद उनकी नौकरियां न रहें, खासकर अगर यह युद्ध महीनों तक खिंचता है. इसका सबसे बुरा और तुरंत असर उन क्षेत्रों में पड़ा है जहां प्रवासी मजदूर सबसे ज्यादा काम करते हैं, जैसे कि हवाई यात्रा और पर्यटन. फिर भी, घबराहट में अचानक पैसे भेजने की वजह से पेमेंट सिस्टम में आई कुछ छिटपुट दिक्कतों को छोड़ दें, तो युद्ध का अभी तक घर भेजे जाने वाले पैसे (रेमिटेंस) पर कोई खास असर नहीं पड़ा है. पैसा अभी भी पहले की तरह ही भेजा जा रहा है.

अब तक ज्यादा असर नहीं

सिंगापुर की मैक्रोइकोनॉमिक और जियोपॉलिटिकल रिस्क रिसर्च फर्म ‘एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक्स' के सीईओ राजीव बिस्वास ने डीडब्ल्यू को बताया, "संघर्ष की अवधि अब तक इतनी कम रही है कि इसका प्रवासी कामगारों के रोजगार या उनके रेमिटेंस ट्रांसफर पर कोई गंभीर असर नहीं पड़ा है.” उन्होंने आगे कहा कि उन्हें लगता है कि यह युद्ध ज्यादा लंबा खिंचने की संभावना कम है.

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बिस्वास कहते हैं, "हालांकि, अगर संघर्ष की अवधि लंबी खिंचती है और महीनों तक चलती है, तो इस बात की आशंका बढ़ जाएगी कि प्रवासी कामगारों की नौकरियों पर असर पड़ेगा. ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि पर्यटन और हवाई यात्रा जैसे बड़े क्षेत्रों को लगातार भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा.”

ओआरएफ से जुड़े विशेषज्ञ पंत ने कहा कि भारत के लिए कुछ अनुमान बताते हैं कि अगर खाड़ी देशों से आने वाले पैसे में 10 से 20 फीसदी की भी कमी आती है, तो भारत को हर साल 5 से 10 अरब डॉलर का भारी नुकसान हो सकता है.

लंदन की एनालिटिक्स फर्म ‘कैपिटल इकोनॉमिक्स' के एक अनुमान के मुताबिक, अगर यह युद्ध कुछ हफ्तों तक चलता है, तो खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं की जीडीपी में 1 से 2 फीसदी की गिरावट आ सकती है. इसका मतलब होगा ‘रेमिटेंस में लगभग 5 फीसदी की गिरावट'.

अगर यह युद्ध तीन महीने या उससे ज्यादा खिंच गया और इसने खाड़ी देशों के ऊर्जा ढांचों (जैसे तेल कुंओं और रिफाइनरियों) को भारी नुकसान पहुंचाया, तो रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि खाड़ी देशों की जीडीपी 10 से 15 फीसदी तक गिर सकती है और रेमिटेंस करीब 30 फीसदी तक कम हो सकता है.

लंबे समय तक युद्ध खिंचने से बढ़ेगी परेशानी

बिस्वास का भी कुछ ऐसा ही मानना है. उन्होंने कहा, "लंबे समय तक युद्ध के खिंचे जाने की संभावना कम है. हालांकि, अगर ऐसा होता है, तो प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली रकम में कमी आ सकती है. रेमिटेंस की स्थिति कितनी जल्दी फिर से सामान्य होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था के मुख्य हिस्से, जैसे कि अंतरराष्ट्रीय पर्यटन और हवाई यात्रा, कितनी जल्दी फिर से पटरी पर लौटते हैं.”

बिस्वास ने इस बात पर जोर दिया कि एक लंबी लड़ाई बड़ी चुनौतियां खड़ी कर सकती है, लेकिन अगर रेमिटेंस में थोड़ी गिरावट आती है और वह जल्द ही ठीक हो जाती है, तो इसका भारत, पाकिस्तान या बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पर कोई बहुत बड़ा बुरा असर पड़ने की संभावना नहीं है. इससे न तो देश के भीतर सामान की मांग कम होगी और न ही विदेशी लेन-देन की स्थिति बिगड़ेगी.

फिलहाल, इन देशों के लिए सबसे बड़ा खतरा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते होने वाली तेल, गैस और खाद की सप्लाई में रुकावट है. हालांकि, अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है और मजदूरों द्वारा घर भेजे जाने वाले पैसे में लंबे समय तक कमी रहती है, तो इससे दक्षिण एशिया की आर्थिक मुश्किलें और भी गहरा जाएंगी.