लकड़बग्घों को नारी शक्ति का प्रतीक मानती हैं ये चित्रकार

लकड़बग्घों को अक्सर बदसूरत, कपटी और क्रूर मुर्दाखोरों के रूप में देखा जाता है लेकिन दक्षिण अफ्रीकी चित्रकार हैनेली कोएत्जी के लिए वो नारी शक्ति और क्वीयर होने के सामान्यीकरण का प्रतीक हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

लकड़बग्घों को अक्सर बदसूरत, कपटी और क्रूर मुर्दाखोरों के रूप में देखा जाता है लेकिन दक्षिण अफ्रीकी चित्रकार हैनेली कोएत्जी के लिए वो नारी शक्ति और क्वीयर होने के सामान्यीकरण का प्रतीक हैं.सेंट्रल जोहानेसबर्ग में हैनेली कोएत्जी के स्टूडियो की दीवारें स्याही और रोइबो की चाय से रंगी लकड़बग्घों की तस्वीरों से भरी हुई हैं. उन्होंने इधर उधर से बटोरी हुई चीजों से बनाई अपनी मूर्तियों में भी क्यूट कानों और डरावने जबड़े वाले इन जानवरों को ही दिखाया है.

53 साल की कोएत्जी की कलाकृतियों की प्रदर्शनी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लग चुकी हैं. अपनी प्रेरणा के बारे में बताते हुए वो कहती हैं कि वो एक ईकोफेमिनिस्ट नजरिए से लकड़बग्घों के बारे में बेहद उत्सुक हैं. कोएत्जी ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, "वो 'अंडरडॉग' हैं, उन्हें अनुचित ढंग से प्रस्तुत किया गया है. उन्हें डिज्नी-फाई कर दिया गया है, ऐसे जीव बना दिया गया है जो वो नहीं हैं."

लकड़बग्घों से 'क्वीयरनेस' का सबक

कोएत्जी लकड़बग्घों के झुंडों में "मातृसत्ता का जश्न" देखती हैं. इन झुंडों की नेता एक दबंग मादा होती है. इसके अलावा झुंडों में भोजन के हिस्से बांटने में भी दूसरी मादाएं हावी रहती हैं. उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के क्रूगर राष्ट्रीय उद्यान में इन जीवों का अध्ययन करने में लंबा समय बिताया है.

इस दौरान उन्होंने पाया कि मादा लकड़बग्घों के जननांग "छद्म-लिंग" जैसे होते हैं जो एक आम पर्यटक को उनके नर होने का आभास कराते हैं. उन्होंने बताया, "मैं खिड़कियां खोल कर स्केच करती थी ताकि मैं उन्हें सूंघ सकूं. गाड़ी में मेरे पास रोइबो की चाय थी तो मैंने उसका इस्तेमाल किया."

बिना साथी के बच्चे पैदा करते हैं ये पशु

कोएत्जी प्रकृति के करीब फ्री स्टेट राज्य के एक छोटे से कस्बे में पली बढ़ें. फ्री स्टेट मोटे तौर पर एक रूढ़िवादी राज्य है. उनका जन्म एक श्वेत परिवार में हुआ जो रूढ़िवादी और होमोफोबिक था. वो कहती हैं, "मैंने कितनी चीजों को दिमाग से निकाल देने में सालों लगाए हैं."

कोएत्जी को सेंट्रल जोहानेसबर्ग में लगे बड़े बड़े भित्ति-चित्रों और इकोलॉजिकल कलाकृतियों के लिए भी जाना जाता है. इनमें पौधों को पानी देने वाले शौचालय भी शामिल हैं. उन्होंने कोविड-19 की तालाबंदी के दौरान चित्र बनाना शुरू किया था.

लकड़बग्घों के प्रति उनका आकर्षण "ईको-क्वीयर" कला के व्यापक प्रोजेक्ट का हिस्सा है जो प्रकृति में क्वीयर-जैसे व्यवहार पर केंद्रित है. कोएत्जी कहती हैं कि यह व्यवहार अपनी गर्दनों का इस्तेमाल कर लड़ते हुए नर जिराफों में, लोमड़ियों में और बबूनों में भी देखा जा सकता है.

सहज कराता पशु जगत

उनकी वेबसाइट के मुताबिक वो पशुओं के "एक दूसरे के प्रति झुकाव, जोड़ों के बीच संबंध बनाने, कामुक आलिंगन, डांस, प्रणय, मैथुन, हवा में चुंबन" जैसी चीजों पर अपना ध्यान केंद्रित करती हैं. वेबसाइट पर बताया गया है कि कोएत्जी "इस कलाकृति के लिए क्वीयर जीव जंतुओं का एक संकलन बना रही हैं ताकि वो यह दिखा सकें कि कैसे उन्हें देखने से प्रकृति में मौजूद 'नॉन-हेट्रोनोर्मेटिव' लैंगिकता को सामान्य मानने में मदद मिलती है."

उन्होंने एएफपी को बताया,"इंसानों को यह मानना सिखाया गया है कि पशुओं का व्यवहार सिर्फ प्रजनन से निर्धारित होता है, लेकिन "वह उससे कहीं ज्यादा है." उन्होंने खुद एक महिला से शादी की है. वो कहती हैं कि पशु जगत की तस्वीर में "हम सब क्वीयर होने से सहज हो सकते हैं. यह अब कोई असंगत चीज नहीं है."

पशुओं में भी ज्यादा जीती हैं मादाएं

इसी साल मई में कोएत्जी वॉशिंगटन में अपनी एकल प्रदर्शनी पेश करने वाली हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के प्रशासन के तहत हो रही घटनाओं के बारे में वो कहती हैं कि यह "औरों से अलग होने के लिए एक डरावना समय है." उन्होंने आगे कहा, "मैं कहानियां सुना कर इस 'अदरिंग' को सामान्य बना रही हूं और उसका जश्न मना रही हूं, यह दिखा रही हूं कि यह उतना अजीब नहीं है."

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