नई स्टडी में खुलासा, ऑक्टोपस का रहस्यमय "सेक्स आर्म"

ऑक्टोपस बिना देखे अपना शिकार चुनते हैं और अंधेरे में भी अपना साथी खोज लेते हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

ऑक्टोपस बिना देखे अपना शिकार चुनते हैं और अंधेरे में भी अपना साथी खोज लेते हैं. ऑक्टोपस की हैरतअंगेज बांहें प्रकृति का अद्भुत डिजाइन हैं.ऑक्टोपस की दुनिया अनोखी और दिलचस्प है. जितना हम उसके बारे में जानते हैं, वो हमें उतने ही और नए रहस्य थमा देता है. हम आज भी उसके बारे में नई-नई बातें जान रहे हैं. मसलन, उसका दिमाग कैसे काम करता है, उसकी आठ भुजाएं कैसे अलग-अलग सोच सकती हैं और उसका खून नीला क्यों होता है.

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समुद्र में रहने वाली कई ऑक्टोपस प्रजातियां ऐसी जगह पर रहती हैं, जहां हर समय तकरीबन घुप अंधेरा होता है. ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब देखने की क्षमता काम नहीं करती, तब साथी की पहचान कैसे होती है और बिना देखे कैसे पार्टनर तक स्पर्म पहुंचाया जाता है.

यही वजह है कि ऑक्टोपस की प्रजनन क्रिया (मेटिंग) वैज्ञानिकों के लिए लंबे समय तक एक रहस्य बनी रही. अब हार्वर्ड के शोधकर्ताओं ने इस रहस्य को सुलझा लिया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, उन्हें यह पहले से ही पता है कि नर ऑक्टोपस की आठ बांहों में से एक खास बांह प्रजनन के लिए इस्तेमाल होती है. इसको "हेक्टोकॉटिलस" कहा जाता है.

इसके जरिये नर न केवल मादा की पहचान करता है, बल्कि उसके अंदरूनी अंग के सही स्थान पर स्पर्म भी पहुंचाता है. हार्वर्ड के शोधकर्ताओं द्वारा बेलोनो लैब (हार्वर्ड की जीवविज्ञान व न्यूरोसाइंस रिसर्च लैब) में किए गए नए शोध से पता चला है कि यह विशेष बांह अपने साथी तक सिर्फ स्पर्म ही नहीं पहुंचाती, बल्कि एक रासायनिक सेंसर की तरह भी काम करती है.

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यह सेंसर मादा ऑक्टोपस के शरीर से निकलने वाले प्रोजेस्टेरॉन हॉर्मोन की पहचान करता है. इस रासायनिक पहचान के कारण नर ऑक्टोपस समुद्र के गहरे अंधेरे में भी अपने साथी को खोज लेते हैं. इस शोध का नेतृत्व करने वाले, हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर निकोलस बेलोनो ने साइंस जर्नल में लिखा, "यह खोज बताती है कि ऑक्टोपस अपने साथी को कैसे पहचानते हैं और प्रजनन की प्रक्रिया को कैसे आगे बढ़ाते हैं."

देखे बिना साथी की पहचान का रहस्य

'साइंस' जर्नल में छपे रिसर्च पेपर के अनुसार वैज्ञानिक पाब्लो विलार, निकोलस बेलोनो और उनकी टीम ने प्राकृतिक वातावरण से पकड़े गए ऑक्टोपस (ऑक्टोपस बाईमाक्यूलॉइडेस) पर एक दिलचस्प प्रयोग किया. योजना यह थी कि दोनों ऑक्टोपस पहले एक-दूसरे से परिचित हो जाएं, इसके बाद उनके बीच लगाई गई दीवार को हटा दिया जाएगा.

इसलिए उन्होंने नर और मादा ऑक्टोपस के बीच एक अपारदर्शी दीवार बनाकर उन्हें अलग कर दिया. इस दीवार में कई छोटे-छोटे छेद बनाए गए थे, ताकि नर ऑक्टोपस इन छेदों के सहारे अपनी विशेष बांह को मादा के शरीर तक पहुंचा पाए. वैज्ञानिकों के लिए हैरानी की बात यह हुई कि बहुत कम दिखाई देने के बावजूद, नर ने अपनी खास बांह दीवार के पार बढ़ाई और सावधानी से मादा के शरीर में सही जगह तक पहुंचाने में कामयाब रहा.

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इसके बाद दोनों काफी देर तक स्थिर रहे, जब तक प्रजनन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई. कम रोशनी के बावजूद भी इसी तरह के नतीजे कई अन्य नर-मादा जोड़ों में भी मिले. इसके उलट, जब नर-नर जोड़ों को साथ रखा गया तो वे अपनी बांहों से आपस में स्पर्श करते रहे, लेकिन प्रजनन की कोशिश नहीं की. रिसर्च टीम का मानना है कि इससे साफ होता है मादा से जुड़ा कोई विशेष संकेत ही इस प्रजनन प्रक्रिया को शुरू करता है.

कौन सा विशेष संकेत बनाता है मादा ऑक्टोपस को खास?

पहले प्रयोग के बाद वैज्ञानिकों ने यह जानना चाहा कि आखिर मादा ऑक्टोपस में ऐसा कौन सा खास संकेत है, जो प्रजनन की शुरुआत करता है. वैज्ञानिकों ने मादा ऑक्टोपस के शरीर के अलग-अलग हिस्सों से टिशू की जांच की. उन्होंने पाया कि उनके अंडाशय, ओविडक्ट और त्वचा में "प्रोजेस्टेरॉन" नाम का हॉर्मोन होता है. क्या प्रजनन की क्रिया शुरू करने के लिए प्रोजेस्टेरॉन ही काफी है, इस बात का पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों ने दोबारा एक प्रयोग किया.

पिछली बार की तरह दोनों ऑक्टोपसों को एक दीवार के जरिए अलग-अलग रखा गया. फिर प्रजनन प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही मादा ऑक्टोपस को छोटी नलियों से बदल दिया गया. कुछ नलियों पर प्रोजेस्टेरॉन और कुछ नलियों पर अन्य रसायनों को लगाया गया और इन्हें दीवार में बने छोटे-छोटे छेदों से जोड़ दिया गया.

जब नर ऑक्टोपस की उस खास बांह ने प्रोजेस्टेरॉन वाली नली को महसूस किया, तो उसका व्यवहार वैसा ही हो गया जैसा मादा के पास होने पर होता है. वह मादा को तलाश करने की जगह प्रोजेस्टेरॉन वाली नली को खोजने और छूने लगा. वैज्ञानिकों की टीम इस निष्कर्ष पर पहुंची कि ऑक्टोपस के बीच प्रजनन प्रक्रिया शुरू होने में प्रोजेस्टेरॉन मुख्य भूमिका निभाता है.

नए शोधों से खुलते नए राज

साल 2020 के "सेल जर्नल" में छपे लेना वान गीसेन के रिसर्च पेपर से पता चला था कि कैसे ऑक्टोपस अपनी बांह में मौजूद सक्शन कप्स से "टेस्ट बाय टच" (छूकर स्वाद लेना) की प्रणाली का इस्तेमाल कर अपने शिकार को पहचानता है. यह तय करता है कि कोई चीज खाने लायक है या नहीं और कैसे बिना देखे आस-पास की चीजों को टटोलता है. आसान शब्दों में कहें, तो ऑक्टोपस अपनी भुजाओं का इस्तेमाल जीभ की तरह भी करते हैं.

इसी तरह, 2026 में आए नए रिसर्च पेपर के अनुसार सही साथी को खोजने के लिए जानवर अक्सर अपनी बांहों में मौजूद इंद्रियों और अलग-अलग संकेतों का इस्तेमाल करते हैं. इंद्रियों और विशेष संकेतों का यह जुड़ाव प्रजनन प्रक्रिया को आसान और बेहतर बनाता है.

इन दोनों शोध को साथ रखकर देखने पर एक बात जरूर साफ होती है कि कैसे ऑक्टोपस अपनी बांहों का प्रयोग अलग-अलग तरह से करते हैं. वे अपनी बांह को न सिर्फ छूकर जानकारी लेने, बल्कि बिना देखे खोजबीन करने और यहां तक कि प्रजनन के लिए अंधेरे में सही साथी को पहचानने में भी इस्तेमाल करते हैं.

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