‘सिविल सोसायटी एटलस’ ने जर्मनी की रैंकिंग घटाई
एक नई रिपोर्ट का कहना है कि जर्मनी अब “ओपन सोसाइटी” की श्रेणी में पूरी तरह फिट नहीं बैठता.
एक नई रिपोर्ट का कहना है कि जर्मनी अब “ओपन सोसाइटी” की श्रेणी में पूरी तरह फिट नहीं बैठता. बढ़ती गलत जानकारी, पुलिस की सख्ती और माइग्रेशन, एलजीबीटीक्यू+ व पर्यावरण जैसे मुद्दों पर बढ़े दबाव को इसकी वजह बताया गया है.जर्मनी में सिविल सोसाइटी और लोकतंत्र की स्थिति पर अपनी वार्षिक रिपोर्ट पेश करते हुए 'ब्रोट फ्यूर दी वेल्ट' संस्था की अध्यक्ष डागमार प्रुइन कहती हैं कि "दुनिया भर में अधिकांश लोग खुलकर अपनी बात नहीं कह पाते." उनके अनुसार, जर्मनी में भी कुछ मुद्दों और नैरेटिव्स को जानबूझकर दबाया जा रहा है. उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे राइट-विंग चरमपंथियों द्वारा उठाई जाने वाली आवाजों को खास ‘विचारधारा' से जुड़ी बात कहकर खारिज कर दिया जाता है.
'एटलस ऑफ सिविल सोसायटी' एक ऐसी रिपोर्ट है, जिसे 'ब्रोट फ्यूर दी वेल्ट' हर साल प्रकाशित करती है. यह संस्था जर्मनी की प्रोटेस्टेंट चर्चों के सहयोग से चलती है और दुनिया में भूख कम करने व विकास को बढ़ावा देने पर काम करती है. इस रिपोर्ट को अक्सर अन्य संगठनों के साथ मिलकर तैयार किया जाता है. इस साल इस रिपोर्ट में 'गलत जानकारी'(डिसइन्फॉर्मेशन) को खास मुद्दा बनाया गया है.
जर्मनी की वैश्विक रैंकिंग गिरी: खुलापन हुआ ‘सीमित'
एटलस ऑफ सिविल सोसाइटी की यह रिपोर्ट दुनिया भर में एनजीओ, विरोध प्रदर्शन और मीडिया स्वतंत्रता की स्थिति को ध्यान में रखकर बनाई जाती है. इस साल की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की केवल 3.4 फीसदी आबादी ही पूरी तरह खुले समाज में रहती है, जबकि लगभग 30.7 फीसदी लोग पूरी तरह बंद और सख्त शासन वाले देशों में रहते हैं.
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इस बारे में 'ब्रोट फ्यूर दी वेल्ट' संस्था के मानवाधिकार विशेषज्ञ सिल्के फाइफर का कहना है, "इस साल ‘सीमित खुलापन' वाली श्रेणी में आने वाले समाजों की संख्या में 7 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है." उन्होंने आगे कहा कि इसमें कई विकसित और खुद को लोकतांत्रिक कहने वाले देश, जैसे अमेरिका, फ्रांस, इटली और जर्मनी भी शामिल हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, किसी देश को ‘सीमित' श्रेणी में तब रखा जाता है जब एनजीओ और कार्यकर्ताओं पर कड़ी निगरानी रखी जाती है. देशों को इस श्रेणी में तब भी रखा जाता है, जब विरोध प्रदर्शन को कभी‑कभी हिंसक तरीके से दबाया जाता है और असहमति की आवाजों को सेंसर किया जाता है.
सिल्के फाइफर के अनुसार, जर्मनी में प्रदर्शनों के दौरान बढ़ती पुलिस की सख्ती और गिरफ्तारियां उसकी रैंकिंग में गिरावट का मुख्य कारण बनीं. उन्होंने बताया कि इसका सबसे ज्यादा असर गाजा के नागरिकों के समर्थन में हुए प्रदर्शन और जलवायु से जुड़े आंदोलनों पर पड़ा. साथ ही, देश में क्वीयरफोबिया, सेक्सिज्म, नस्लवाद और यहूदी विरोध (एंटीसेमिटिज्म) जैसे भेदभाव के मामलों में भी बढ़ोतरी देखी गई.
एआई के बढ़ते प्रभाव के साथ फैल रही फर्जी खबरें
इस साल की रिपोर्ट में खास तौर पर दुनिया भर में गलत जानकारी (डिसइन्फॉर्मेशन) के बढ़ने पर जोर दिया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, एआई के दौर में फर्जी खबरें तेजी से बढ़ रही हैं और जर्मनी भी इससे अछूता नहीं है. अर्नस्ट एंड यंग नाम की एक कंपनी के एआई सेन्टीमेंट इंडेक्स के तहत 15 देशों के 15,000 लोगों का इंटरव्यू लिया गया. इस सर्वे के अनुसार, 75 फीसदी लोग एआई से गलत जानकारी मिलने को लेकर चिंतित हैं, लेकिन सिर्फ एक‑तिहाई लोग ही इस जानकारी की सच्चाई की जांच करते हैं.
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नई रिपोर्ट बताती है कि एआई से फैल रही गलत जानकारी मुख्य रूप से अपराध से जुड़े माइग्रेशन को लेकर है. इसके अलावा, यह रिपोर्ट एलजीबीटीक्यू+समुदाय और जलवायु परिवर्तन से जुड़े विषयों पर भी केंद्रित है.
साल 2021 में जर्मनी के 23 फीसदी लोगों का मानना था कि जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक कारणों से होता है और इसका इंसानी गतिविधियों से कोई संबंध नहीं है. हालांकि, यह आंकड़ा अब बढ़कर 33 फीसदी हो गया है. पूरे यूरोपीय संघ की बात की जाए, तो यह आंकड़ा पिछले पांच साल में 25 फीसदी से बढ़कर साल 2025 में 35 फीसदी हो चुका है.
अपनी रिपोर्ट में ब्रोट फ्यूर दी वेल्ट ने यूरोपीय संघ से एक्टिविस्ट्स और सिविल सोसाइटी की सुरक्षा बढ़ाए जाने की मांग की. साथ ही, ईयू डिजिटल सर्विसेस एक्ट के नियमों को भी सख्ती से लागू करने की बात रखी है. रिपोर्ट के अनुसार, यह कानून मेटा और गूगल जैसी कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म पर गलत जानकारी और हेट स्पीच के लिए जिम्मेदार ठहराता है. हालांकि, कानूनी छूट और अस्पष्ट भाषा के कारण बड़ी टेक कंपनियां इस दिशा में सीमित प्रयास करती हैं.
(The above story first appeared on LatestLY on May 19, 2026 07:40 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

