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ईरान में जारी युद्ध के साये में कितनी असरदार है भारत की बहु-पक्षीय रणनीति

भारत ने पश्चिम एशिया की परस्पर विरोधी ताकतों के बीच जिस सावधानी से संतुलन बनाए रखा है, वह उसकी बड़ी उपलब्धि रही है.

ईरान में जारी युद्ध के साये में कितनी असरदार है भारत की बहु-पक्षीय रणनीति
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

भारत ने पश्चिम एशिया की परस्पर विरोधी ताकतों के बीच जिस सावधानी से संतुलन बनाए रखा है, वह उसकी बड़ी उपलब्धि रही है. हालांकि, मौजूदा संकट यह संकेत दे रहा है कि यह संतुलन बनाए रखना भारत के लिए कितना मुश्किल होता जा रहा है.भारत को लंबे समय से इस बात पर गर्व रहा है कि उसने ऐसे काम किए हैं, जिन्हें कुछ बड़ी ताकतें ही कर पाई हैं. उसने ईरान से तेल खरीदा, इस्राएल के साथ रक्षा संबंध बनाए, अमेरिका के साथ रिश्ते मजबूत किए और खाड़ी देशों के राजघरानों के साथ आर्थिक संबंध बढ़ाए. साथ ही, उसने इस बात पर भी जोर दिया कि वह किसी क्षेत्रीय गुट या औपचारिक गठबंधन में शामिल नहीं होगा.

हालांकि, ईरान युद्ध भारत के इस पुराने फॉर्मूले की कड़ी परीक्षा ले रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी इसका दबाव साफ दिख रहा है. वे 15 से 20 मई के बीच 6 दिनों में पांच देशों एक अहम कूटनीतिक दौरे पर निकले हैं, जिसमें वे संयुक्त अरब अमीरात और चार यूरोपीय देशों की यात्रा कर रहे हैं.

भारत के लिए ईरान युद्ध केवल किसी दूरदराज इलाके में पैदा हुआ ऊर्जा संकट भर नहीं है. यह भारत की मध्य-पूर्व विदेश नीति के उस मूल सिद्धांत के लिए सीधी चुनौती है, जिसके तहत भारत यह मानता आया है कि वह इस क्षेत्र की हर बड़ी शक्ति के साथ संबंध बनाए रखते हुए भी अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बरकरार रख सकता है. भले ही, उन शक्तियों के बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता क्यों न हो.

ज्यादा मुश्किल माहौल का सामना कर रहा है भारत

अमिताभ मट्टू, दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के डीन हैं. वह कहते हैं कि भारत ने दशकों तक ऐसा संतुलन बनाने में महारत हासिल की, जिसकी जड़ें ‘कठोर यथार्थवाद' में थीं. दूसरे शब्दों में कहें, तो भारत ने अपनी विदेश नीति को जमीनी हकीकत और राष्ट्रीय हितों के आधार पर बेहद सधे हुए अंदाज में तय किया है.

मट्टू ने डीडब्ल्यू से कहा, "लेकिन ईरान युद्ध ने इस समीकरण को कहीं ज्यादा मुश्किल बना दिया है. रणनीतिक स्वायत्तता सबसे अच्छी तरह तब काम करती है, जब दुनिया में कई शक्तियां हों और हालात बदलते रहते हों.” उन्होंने आगे कहा, "यह तब और भी मुश्किल हो जाता है, जब विरोधी खेमे एक ही समय पर राजनीतिक वफादारी, प्रतिबंधों का पालन और सुरक्षा तालमेल इन सभी की मांग करने लगते हैं.”

मट्टू इस बात को लेकर बिल्कुल स्पष्ट हैं कि जब संकट गहराता है और दबाव अपनी चरम सीमा पर पहुंचता है, तो रणनीतिक व्यवस्था का कौन सा हिस्सा सबसे पहले बिखरता है. बतौर मट्टू, "अगर बात हद से आगे बढ़ जाती है, तो भारत हमेशा अपनी आर्थिक स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा को सबसे ज्यादा प्राथमिकता देगा. भारत की कोई भी सरकार लंबे समय तक तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव, होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही में रुकावटें या लगातार बढ़ती घरेलू महंगाई को बर्दाश्त नहीं कर सकती.”

हालांकि, वे इस तरह के कदमों को अमेरिका या इस्राएल के साथ रिश्तों में दरार कहने से बचते हैं. मट्टू कहते हैं, "भारत के व्यापक रणनीतिक भविष्य के लिए अमेरिका के साथ बेहतर संबंध बहुत जरूरी है. चाहे वह तकनीक हो, रक्षा हो, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में संतुलन बनाना हो या वैश्विक पूंजी तक पहुंच. इस्राएल एक महत्वपूर्ण रक्षा और खुफिया साझेदार बना हुआ है. खाड़ी देश ऊर्जा, प्रवासियों द्वारा भेजे जाने वाले धन और वहां रहने वाले भारतीयों की स्थिरता के लिए मायने रखते हैं. वहीं, भौगोलिक स्थिति और महाद्वीपीय पहुंच के लिए ईरान का अपना महत्व है.”

उनके आकलन के मुताबिक, इस संकट ने जिस चीज को उजागर किया है वह महज एक नीतिगत दुविधा से कहीं ज्यादा बड़ी बात है. उन्होंने कहा, "भारत अब पश्चिम एशिया में सिर्फ एक दर्शक बनकर नहीं रह गया है. इस क्षेत्र पर उसकी निर्भरता का मतलब है कि वहां तनाव बढ़ने की हर घटना अब सीधे तौर पर भारत की ‘महाशक्ति' बनने की महत्वाकांक्षाओं की परीक्षा लेती है. रणनीतिक स्वायत्तता अब महज एक नारा नहीं रह गई है, बल्कि यह एक ‘कड़ी परीक्षा' बन गई है.”

समुद्री रास्ते बनेंगे ताकत का अखाड़ा?

मट्टू जिस विरोधाभास की बात कर रहे हैं, वह किसी बाहरी विफलता से नहीं, बल्कि भारत की अपनी कूटनीतिक कामयाबियों से उपजा है. भारत ने पिछले दशकों में जो सफलता हासिल की है, वही अब उसके लिए जटिल पहेली बन गई है.

मट्टू कहते हैं, "भारत रणनीतिक स्वायत्तता चाहता है, लेकिन वैश्विक स्तर पर उसका जुड़ाव जितना गहरा होता जा रहा है, बड़े संघर्षों के समय भू-राजनीतिक रूप से ‘गुटनिरपेक्ष' रहना उतना ही कठिन होता जा रहा है. मौजूदा दौर में गुटों में बंटे हुए पश्चिम एशिया में तटस्थ बने रहना अब एक सामान्य नीति नहीं, बल्कि एक ऐसा ‘विशेषाधिकार' है जिसे बरकरार रखना अब भारत के बस के बाहर होता जा रहा है.”

कठिन समय में बहु-पक्षीय कूटनीति पर टिके रहना

हर कोई इस बात को नहीं मानता कि भारत का यह सिद्धांत पूरी तरह से खत्म होने की कगार पर है. रिटायर्ड राजनयिक और फलीस्तीनी अथॉरिटी में भारत के पहले प्रतिनिधि रहे टी. एस. तिरुमूर्ति का तर्क है कि ईरान युद्ध वास्तव में, नई दिल्ली के लिए इसी मौजूदा रास्ते पर बने रहने का एक बड़ा कारण है.

उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "अब तक, पश्चिम एशिया सहित अन्य देशों के मामले में हमारी बहु-पक्षीय नीति ने हमें बहुत लाभ पहुंचाया है. स्वतंत्र निर्णय लेने तथा क्षेत्रीय विवादों के बीच रास्ता खोजने के हमारे दायरे को बढ़ाया है. जब हम इस नीति से भटकते हैं और किसी एक पक्ष की ओर झुकने की कोशिश करते हैं, तब हमारी रणनीतिक आजादी और विकल्प सीमित हो जाते हैं.”

भारत ने दी 1.3 लाख करोड़ के समुद्री बीमा पूल को मंजूरी

उन्होंने इस विचार को भी खारिज कर दिया कि भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारियों के बीच किसी एक को चुनने का ही विकल्प है. उन्होंने कहा, "असल में, हमने हाल के दिनों में ऐसे मुद्दों के बीच सफलतापूर्वक संतुलन बनाया है. हमने अपनी ऊर्जा आपूर्ति भी सुरक्षित रखी है. साथ ही, इस्राएल और अमेरिका के साथ अपने अच्छे संबंध भी बनाए रखे हैं. हाल का इतिहास ऊर्जा सुरक्षा पर भारत के फैसलों की समझदारी को साबित करता है.”

भारत का तेल भंडार घटने से बढ़ रहा दबाव

भारत की संतुलन बनाए रखने वाली इस रणनीति को जारी रखने की क्षमता सिर्फ कूटनीतिक कौशल पर निर्भर नहीं करती. यह देश की आर्थिक मजबूती पर भी निर्भर करती है. अगर क्षेत्रीय संघर्ष लंबे समय तक चलता है, तो उससे पड़ने वाला आर्थिक बोझ भारत के लिए संभालना लगातार मुश्किल होता जाएगा.

भारत कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के बड़े हिस्से के आयात के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है. 90 लाख से अधिक भारतीय खाड़ी देशों में रहते और काम करते हैं. उनके द्वारा भेजा गया पैसा भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा सहारा है.

होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे संवेदनशील बिंदु बना हुआ है. इसमें रुकावट की जरा सी आशंका भी भारत के आयात के हिसाब-किताब, बीमा लागत, महंगाई और वित्तीय स्थिरता के लिए एक बड़ा झटका साबित होती है.

भारत ने इस स्थिति से निपटने के लिए अलग-अलग देशों से तेल खरीदना शुरू किया है. व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के लिए भारतीय नौसेना को तैनात किया गया है, लेकिन ये दोनों ही कदम काफी महंगे साबित हो रहे हैं. हालांकि, भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार अस्थायी झटकों को तो झेल सकते हैं, लेकिन वे खाड़ी क्षेत्र में लंबे समय तक चलने वाले किसी संघर्ष का सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं.

ईरान में पूर्व राजदूत: 'भारत को तटस्थ बने रहना चाहिए'

ईरान में पूर्व राजदूत रहे गद्दम धर्मेंद्र का कहना है कि भारत, गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) के सदस्यों के साथ अपने ‘ऐतिहासिक रूप से करीबी रिश्तों' का विस्तार कर रहा है. इन सदस्यों में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन शामिल हैं.

धर्मेंद्र ने डीडब्ल्यू को बताया, "इसलिए, नई उभरती दरारों के बीच भारत किसी एक पक्ष का साथ देने से बचेगा. ऊर्जा के बड़े आयातक के तौर पर, भारत की रणनीतिक प्राथमिकता अपनी हाइड्रोकार्बन (तेल और गैस) आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करनी होगी. होर्मुज में रुकावट और खाड़ी देशों में ऊर्जा के बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान ने इस क्षेत्र पर भारत की पारंपरिक निर्भरता को गंभीर दबाव में डाल दिया है.”

हालांकि, धर्मेंद्र यह भी मानते हैं कि भारत संतुलन बनाने की अपनी रणनीति को पूरी तरह छोड़ने के बजाय उसमें कुछ बदलाव करेगा. बतौर धर्मेंद्र, "इस स्थिति में अमेरिका, भारत के ऊर्जा आयात में बड़ी भूमिका निभा सकता है. चूंकि अमेरिका अब भारी मात्रा में कच्चे तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस का निर्यात कर रहा है, वह भारत की खाड़ी देशों पर निर्भरता को कम कर सकता है. इसलिए, हमें इसे ‘जीरो-सम गेम' (एक का नुकसान, दूसरे का फायदा) के रूप में देखने के बजाय, ‘नेट-नेट विन' (दोनों के लिए फायदेमंद स्थिति) के रूप में देखना चाहिए.”

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ‘तटस्थता का रुख बनाए रखना हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन खाड़ी में हो रहे बदलावों के कारण अब यह जरूरत बन गया है.”

क्या भारत अब अमेरिका-इस्राएल की ओर झुक रहा है?

सबसे असहज करने वाला सवाल यह नहीं है कि क्या भारत औपचारिक रूप से किसी एक पक्ष को चुनेगा, बल्कि यह है कि क्या उसके फैसलों का असर पहले से ही उसके लिए वह चुनाव कर रहा है?

स्वतंत्र शोध मंच ‘मांत्रया' की संस्थापक शांथी मैरिएट डिसूजा कहती हैं कि भारत ने ऐतिहासिक रूप से ‘रणनीतिक स्वायत्तता' को ऐसे लचीले सिद्धांत के रूप में इस्तेमाल किया है जो विरोधाभासी संबंधों के बीच भी तालमेल बिठाने में सक्षम है.

डिसूजा ने डीडब्ल्यू को बताया, "यह अवधारणा खुद दबाव में नहीं आई है, लेकिन परस्पर विरोधी हितों वाले देशों के साथ संबंधों को संतुलित करने की भारत की क्षमता निश्चित रूप से भारी दबाव में है. यदि यह युद्ध और अधिक लंबा खिंचता है, तो यह संतुलन बनाए रखना लगभग असंभव हो जाएगा.”

भले ही भारत औपचारिक रूप से किसी गुट में शामिल होने का विरोध करना जारी रखे हुए है, लेकिन उसकी सबसे गहरी रणनीतिक, तकनीकी और आर्थिक साझेदारियां तेजी से अमेरिका, इस्राएल और प्रमुख खाड़ी देशों के साथ मजबूत हो रही हैं. इस दौरान, वह ईरान के साथ भी कामकाजी संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा है.

डिसूजा ने कहा, "भारत अभी भी इस बात पर दांव लगाएगा कि मध्यस्थता के जरिए युद्ध जल्द ही समाप्त हो जाए, जो कि सबसे अच्छी स्थिति होगी. प्रधानमंत्री मोदी का मौजूदा बहु-राष्ट्रीय दौरा, जिसकी शुरुआत यूएई से हो रही है, संभवतः इन्हीं राजनयिक कोशिशों को दिखाता है.”

(The above story first appeared on LatestLY on May 19, 2026 07:40 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).