ऑफिस ही नहीं, किचन का काम भी आसान कर रहा एआई

भारत में महिलाओं ने रोजमर्रा के आम फैसलों और कामों में एआई का इस्तेमाल शुरू कर दिया है हालांकि इसे लेकर जानकारों का रुख बेहद मिला-जुला है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

भारत में महिलाओं ने रोजमर्रा के आम फैसलों और कामों में एआई का इस्तेमाल शुरू कर दिया है हालांकि इसे लेकर जानकारों का रुख बेहद मिला-जुला है.प्रियांशी दुर्भा एक दशक से नई तकनीकों से जुड़ी नौकरी कर रही हैं. अभी वह कंपनियों को सिखाती हैं कि कैसे अपने काम में एआई का इस्तेमाल किया जा सकता है. पर एआई के जरिए उनके लिए सबसे बड़ा बदलाव ऑफिस में नहीं, बल्कि उनकी रसोई में हुआ है. एक आम वीकेंड पर उन्हें इसका आइडिया आया. उनके पास काफी काम था और उनका दिमाग थका हुआ था. उन्हें मैराथन धावक पति के लिए प्रोटीन युक्त खाने का इंतजाम करना था और बच्चे की पसंद इससे अलग थी. तब उन्होंने चैटजीपीटी को अपना खाने से जुड़ी चीजों का स्टॉक दिखाकर खाने का प्लान मांगा. इस एआई टूल ने नाश्ता, लंच, डिनर सभी का प्लान बना दिया. उन्होंने उसे फ्रिज पर टांगा और बेहद राहत महसूस की. वह कहती हैं, "मैंने ये प्लान देखकर सोचा, अब मैं दुनिया जीत सकती हूं."

इस मामले में प्रियांशी अकेली नहीं हैं, बल्कि एआई के किचन पर असर को साफ महसूस किया जा सकता है. भारत में एआई को काफी तेजी से अपनाया गया है. माइक्रोसॉफ्ट और लिंक्डइन की 2024 वर्क ट्रेंड रिपोर्ट भी यही दावा करती है. स्किल्ड वर्कफोर्स में शामिल 92 फीसदी लोग एआई टूल्स इस्तेमाल कर रहे हैं. जबकि इस मामले में दुनिया का औसत 75 प्रतिशत है, यानी एआई को अपनाने के मामले में भारत काफी आगे है. ओपेनएआई के लिए भारत दूसरा सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है. इसका असर शहरी कामकाजी महिलाओं के जीवन में भी दिख रहा है. इन महिलाओं पर ऑफिस, घर और देखरेख- सब संभालने के चलते बोझ ज्यादा होता है. ऑफिस और घर के बीच संतुलन इनके लिए बड़ी समस्या होती है. एआई इस समस्या के हल में थोड़ी, मगर असरदार मदद कर रहा है.

एआई टूल बन रहे महिलाओं के साथी

डिजिटल कल्चर पर रिसर्च कर रहीं पायल अरोड़ा इन एआई टूल्स को साथी मानती हैं. उनका कहना है, "ये टूल केवल सुविधा नहीं रहे. ये औरतों के साथ चलने वाले साथी बन गए हैं. महिलाओं के ऊपर परिवार, ससुराल, नौकरी सब एक साथ संभालने की अपेक्षाएं होती हैं. कोई भी चूक किए बिना सब कुछ निभाने का दबाव होता है. एआई उस दबाव में सांस लेने की जगह देता है. निर्णय जल्दी लिए जा सकते हैं और इससे थकान थोड़ी कम होती है. काम टुकड़ों में बंटता है, मन व्यवस्थित होता है. महिलाएं महसूस करती हैं कि उनका जीवन पर नियंत्रण बढ़ा है और रचनात्मकता लौट रही है. यह बदलाव घर के भीतर सबसे साफ दिखता है."

मुंबई की स्तुति अग्रवाल दो बच्चों की मां हैं. वो कंटेंट क्रिएटर हैं और उनके मुताबिक, उनके दिमाग में टैब्स खुली रहतीं हैं. एक टैब बंद होता है, तुरंत दूसरा टैब खुल जाता है. उन्होंने एआई से अपने कामों का हल निकालने का तरीका खोजा है. बच्चे के स्कूल सर्कुलर का ब्रीफ चाहिए तो एक क्लिक में काम हो जाता है. टीचर को मैसेज लिखना हो तो ड्राफ्ट बनवा लेती हैं. किचन के लिए हफ्ते भर की खाने की योजना चाहिए हो तो वो भी मिल जाती है. वो कहती हैं कि इसकी मदद से कई छोटे-छोटे निर्णय आराम से हो जाते हैं, मन बड़ा शांत रहता है. घर और काम, दोनों ही जगहों पर महसूस होता है कि कम ऊर्जा में काम हो गया. वह कहती हैं, "अब नियंत्रण मेरे हाथ में रहता है.”

महिलाओं के करियर में भी सहायक

लखनऊ की गैलेक्सी अरोड़ा सेठ मैटरनिटी और बेबी फोटोग्राफर हैं. वह जेनरेटिव टूल्स की मदद से अपने छोटे से बच्चे के करने के लिए गतिविधियां तय करती हैं. उसके हिसाब से खेलों, कला और कहानियों के सुझाव लेती हैं. ब्रांड्स के लिए जो कंटेंट वो बनाती हैं, उसके लिए स्क्रिप्ट की ब्रेनस्टॉर्मिंग भी वो एआई के साथ ही करती हैं. अपने बच्चे के लिए संतुलित भोजन का फैसला भी वो एआई के साथ ही लेती हैं.

गैलेक्सी अरोड़ा सेठ कहती हैं, एआई के बाद सुकून और रचनात्मकता बढ़ी है. घरेलू कामकाज अब कम उथल-पुथल वाला महसूस होता है. क्लाइंट प्रोजेक्ट्स पर ध्यान दे पाती हूं. बच्चों का समय भी अर्थपूर्ण और संतुलित बना है. वो कहती हैं, "कमांड्स तो छोटे होते हैं लेकिन नतीजा बड़ा होता है और तुरंत मिलता है."

बेहतर हो रहा महिलाओं का जीवनस्तर

शहरों की महिलाएं घर के बोझ को एआई की मदद से कम करने की कोशिश में हैं. यह उभरता रुझान है, पर इसे लेकर हमारे पास अभी कोई सार्वजनिक आंकड़े नहीं हैं. नीतियां और मान्यताएं जो खाली जगह छोड़ती हैं, उसे तकनीक भरती है. इनसे महिलाओं पर निर्णयों का अकेलापन कम हुआ है और सहयोग का भ्रम पैदा हो रहा है. स्तुति कहती हैं, "चैटजीपीटी जज नहीं करता. आप मन की बात कहो और तुरंत काम पूछो. कोई मैसेज या फिर रेसिपी या फिर एक शॉपिंग लिस्ट. महिलाएं अपने समय की असली कीमत पहचानने लगी हैं. यही समय उनके लिए जीवन के बेहतर होने का सूचक है.

दिल्ली की काउंसलिंग मनोवैज्ञानिक दिविजा भसीन इसमें यह बात जोड़ती हैं कि छोटे-छोटे नतीजों वाले दिमागी काम एआई से करवाना फायदेमंद होता है. यह बढ़े तनाव को कम करता है और समय बचाने में मदद करता है. समय बचता है तो महिलाओं का जीवनस्तर बेहतर बनता है. उनके ऊपर छोटे-छोटे फैसलों का बोझ कम होता, तो उनकी ऊर्जा बचती है. ऊर्जा बचती है, तो उनमें रचनात्मकता और धैर्य बढ़ते हैं. इससे महिलाओं को रिश्तों में टकराव भी अक्सर थोड़ा कम महसूस होता है.

एआई नहीं सुझा पाता मां वाली रेसिपी

एआई की सीमाएं भी हैं, खासकर संस्कृति और भाषाओं को लेकर. प्रियांशी कहती हैं, "एआई मेरी रसोई की बारीकियां नहीं समझता. क्षेत्रीय स्वाद और पारिवारिक रेसिपी अक्सर इससे बनी लिस्ट में छूट जातीं है. एक बार ककड़ियां बची थीं, तो ये उससे बनने वाली चीजों में सिर्फ सलाद ही बता पाया. मां वाले व्यंजन का आइडिया तब भी मेरे दिमाग से ही आया."

इसी साल के नवंबर में खुद ओपेनएआई की ओर से किए एक आकलन में इन कमियों को स्वीकार किया गया था. सबसे लेटेस्ट मॉडल भी भारतीय सांस्कृतिक समझ को लेकर अटकते दिखते हैं. खाने की परंपराएं और भाषाई बारीकियां आसानी से इनके पल्ले नहीं पड़तीं. इसलिए इंसानी दखल अब भी जरूरी बना रहता है. एआई सहायक है, पर अंतिम फैसला इंसान का ही रहता है. ओपेनएआई से जब इस बारे में सवाल पूछा गया तो उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला.

एआई से ना साझा करें घर की सब जानकारियां

गोपनीयता का जोखिम भी इस पूरे मामले में बहुत अहम है. बहुत सी महिलाएं चैटबॉट से मनोवैज्ञानिक थेरेपी में की जाने वाली बातें भी करतीं हैं. घर, बच्चों, स्वास्थ्य, लोकेशन के विवरण खुलकर चैटबॉट को दिए जाते हैं. हालांकि भारत का नया डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून लोगों को अपने डेटा पर अधिकार, उसके इस्तेमाल पर उनकी सहमति देता है. और साथ ही, उल्लंघन रिपोर्ट को अनिवार्य बनाता है. पर घरेलू इस्तेमाल में कुछ चीजें बची भी रह जाती हैं.

दिल्ली में रहने वाले डाटा प्रोटेक्शन वकील विजयंत सिंह कहते हैं, "प्लेटफॉर्म सुरक्षा सुनिश्चित करें, वरना इससे जुड़े कई बड़े खतरे सामने आ सकते हैं. आपके बच्चे का नाम, स्कूल समय चैटबॉट में लिखते ही मामला बदलने लगता है. यह सब डेटा हटा पाना संभव जरूर है, पर मॉडल से इसे हटाना वाकई कठिन है. इसलिए लिखते समय संयम और सतर्कता बरतना जरूरी है."

जानकार मानते हैं कि असली चीज संतुलन है, ऐसे में घबराएं नहीं. जिज्ञासा से सीखें, सावधानी से सीमाएं तय करें. जो महिलाएं इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहीं हैं, यह उनके लिए सहारा बने. जहां नीति चूकती है, वहां तकनीक छोटा सा पुल बनती हैं. ऐसे में औरतें समय बचा रही हैं और मन का भार हल्का कर रही हैं. कहीं खाने का प्लान बनाकर, कहीं मैसेज लिखकर, कहीं काम के प्लान की लिस्ट बनाकर. छोटे कदम एक के बाद एक आगे बढ़ रहे हैं और बड़ा फर्क दिख रहा है. अब एआई साथी है, विकल्प नहीं. यह दिशा दिखाने वाला सहायक है. हालांकि आखिरी निर्णय आपके ही पास है और और उसे पूरा करने का तरीका भी.

(एडी/आरएस)

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