Shab-E-Barat 2026: भारत में 3 फरवरी को मनाई जाएगी शब-ए-बरात, जानें 'माफी की रात' का महत्व और इबादत का तरीका
भारत में मुस्लिम समुदाय 3 फरवरी को शब-ए-बरात मनाएगा। इसे 'माफी की रात' भी कहा जाता है, जो रमजान के पवित्र महीने की शुरुआत से करीब दो हफ्ते पहले आती है/ जानें इस रात का धार्मिक महत्व और निभाई जाने वाली परंपराएं.
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Shab-E-Barat 2026: भारत सहित दुनिया भर में मुस्लिम समुदाय के लिए शब-ए-बरात (Shab-e-Barat 2026) एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आध्यात्मिक रात है. इस वर्ष भारत में यह 15वीं शाबान की रात मंगलवार, 3 फरवरी 2026 को मनाई जाएगी. इसे 'लैलतुल बरात' (Laylatul Bara’at) या 'माफी की रात' (Night of Forgiveness) के नाम से भी जाना जाता है. इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, शाबान महीने की 15वीं तारीख को आने वाली यह रात रमजान के पवित्र महीने के आगमन का संकेत देती है, जो इसके करीब 15 दिनों बाद शुरू होता है. यह भी पढ़ें: Shab e Barat 2026 Mehndi Design: लेटेस्ट मेहंदी डिजाइन और इस रात का धार्मिक महत्व
शब-ए-बरात का अर्थ और धार्मिक महत्व
'शब-ए-बरात' दो शब्दों से मिलकर बना है: फारसी शब्द 'शब' जिसका अर्थ है रात, और अरबी शब्द 'बरात' जिसका अर्थ है मुक्ति या क्षमा. इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात को 'दया के द्वार' (Doors of Mercy) खोल दिए जाते हैं.
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, माना जाता है कि इस रात अल्लाह अपने बंदों के लिए रहमतों की बारिश करता है और उनके पूरे साल का लेखा-जोखा (नसीब और जीविका) तय किया जाता है. मुल्मान इस रात विशेष रूप से अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं और आने वाले साल में बरकत की दुआ करते हैं.
भारत में तारीख और समय
भारत में शाबान के महीने की शुरुआत 21 जनवरी को हुई थी। हालांकि ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह 4 फरवरी की तारीख दिखती है, लेकिन इस्लामिक कैलेंडर में दिन की शुरुआत मगरिब (सूर्यास्त) से होती है. इसलिए, शब-ए-बरात की इबादत 3 फरवरी की शाम से ही शुरू हो जाएगी और पूरी रात चलेगी.
प्रमुख परंपराएं और रीति-रिवाज
इस रात को मनाने के लिए मुस्लिम समुदाय में कई विशेष परंपराएं प्रचलित हैं:
- शब-बेदारी (रात भर इबादत): लोग मस्जिदों और घरों में रात भर जागकर नफ्ल नमाज पढ़ते हैं, कुरान की तिलावत करते हैं और तस्बीह पढ़ते हैं.
- कब्रिस्तान जाना: पूर्वजों और दिवंगत प्रियजनों की कब्रों पर जाकर उनके लिए मगफिरत (क्षमा) की दुआ करना इस रात की एक अहम परंपरा है. माना जाता है कि पैगंबर मोहम्मद (स.अ.व.) भी मदीना के अल-बकी कब्रिस्तान गए थे.
- दान-पुण्य और रोजा: इस अवसर पर गरीबों को खाना खिलाना और हलवा बांटना एक सामाजिक परंपरा है। कई लोग इस रात के अगले दिन (3 फरवरी को) नफ्ल रोजा भी रखते हैं.
क्षेत्रीय नाम और सांस्कृतिक विविधता
शब-ए-बरात को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न नामों से जाना जाता है:
- तुर्की: बेरात कांदिली (Berat Kandili)
- मलेशिया और इंडोनेशिया: निस्फू स्याबान (Nisfu Sya'ban)
- मध्य एशिया: चराग-ए-बरात (Cheragh-e-Barat)
- अरब जगत: लैलतुल बरात (Laylatul Bara’at)
विभिन्न समुदायों के लिए महत्व
सुन्नी मुसलमानों के लिए जहां यह आत्म-चिंतन और क्षमा की रात है, वहीं शिया मुसलमानों (विशेषकर ट्वेल्वर्स) के लिए यह दिन 12वें इमाम, इमाम मुहम्मद अल-महदी की जयंती के रूप में भी बहुत महत्व रखता है। ईरान और इराक जैसे देशों में इस दिन को रोशनी और उत्सव के साथ मनाया जाता है.
दक्षिण एशिया में इस रात पारंपरिक हलवा बनाने और उसे पड़ोसियों व रिश्तेदारों में बांटने का रिवाज है, जो सामुदायिक भाईचारे को बढ़ावा देता है.
(The above story first appeared on LatestLY on Feb 02, 2026 10:45 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

