Pavitra Ekadashi 2019: पवित्रा एकादशी पर सूर्य जलाभिषेक के बाद करें शिव-विष्णु की पूजा, हर मनोकामना होगी पूरी!
पवित्रा एकादशी 2019, (Photo Credits: Facebook)

श्रावण महीने के शुक्लपक्ष की एकादशी को ‘पवित्रा एकादशी’ कहते हैं. देश के कुछ हिस्सों में इसी दिन को पुत्रदा एकादशी नाम से भी पूजा-व्रत रखने का विधान है. मान्यता है कि अपने नाम के अनुरूप इस व्रत की कथा सुनने मात्र से वाजपेयी यज्ञ के फलों की प्राप्ति होती है. भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार निसंतान व्यक्ति यदि इस व्रत पूरी श्रद्धा एवं निष्ठा के साथ करता है तो उसके वंश की वृद्धि होती है, साथ ही उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं. यह श्रावण की अंतिम एकादशी होती है.

सूर्य का जलाभिषेक एवं श्री हरि एवं भगवान शिव की पूजा करें

* पवित्रा एकादशी की प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठें. स्नानादि के पश्चात ताम्र-पात्र से सूर्यदेव का जलाभिषेक करें. जलाभिषेक करते समय सूर्य देव के इस मंत्र ‘ऊँ सूर्याय नम:’ का जाप कम से कम 108 बार अवश्य करें.

* भगवान श्रीहरि को केलों का प्रसाद चढ़ाएं. किसी गरीब को भोजन कराएं और धन का दान करें. इसके साथ ही ‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें.

* पवित्रा एकादशी के दिन किसी शिव मंदिर स्थित शिवलिंग पर तांबे के लोटे से केसर मिश्रित जल चढ़ाएं. साथ ही ‘ऊँ नम: शिवाय’ मंत्र का जाप करें.

* घर के देवालय अथवा किसी विष्णु मंदिर में जाकर भगवान विष्णु एवं लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना करें. पूजा प्रारंभ करने से पूर्व दक्षिणावर्ती शंख से श्री हरि का अभिषेक करें.

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* अगर व्रत कर रहे हैं तो पूरे समय फलाहार करने के पश्चात शाम को श्रीहरि की सांयकालीन पूजा एवं आरती करने के पश्चात ब्राह्मण भोजन करवाकर उसे दान-दक्षिणा देकर विदा करें. इसके पश्चात ही स्वयं भोजन ग्रहण करें.

* सावन की एकादशी पर चांदी के बर्तन से शिवलिंग पर दूध चढ़ाएं. इसके पश्चात अपनी सामर्थ्यानुसार शिवलिंग पर 11, 21,51 अथवा 101 बेल का पत्र चढ़ाएं. हर बेल-पत्र चढाने के साथ ‘ऊँ नम: शिवाय’ मंत्र का जाप भी करें.

* सूर्यास्त के बाद शिवजी के सामने घी का दीप प्रज्जवलित करें तथा शिव मंत्र ‘ऊँ सांब सदा शिवाय नम:’ का जाप कम से कम 108 बार करें.

* सूर्यास्त के बाद तुलसी के पौधे के पास दीप प्रज्जवलित करें और उसकी परिक्रमा करें. गौरतलब है कि सायंकाल के पश्चात तुलसी के पौधे को स्पर्श नहीं करना चाहिए. मान्यता है कि इससे पूजा फलीभूत नहीं होती.

पवित्रा एकादशी की पारंपरिक कथा

प्राचीनकाल में एक नगर में राजा सुकेतुमान राज करता था. राजा अपने सुशासन के लिये आसपास के राज्यों में बहुत लोकप्रिय था. लेकिन राजा को कोई संतान नहीं थी, जिसकी वजह से वह बहुत चिंतित रहता था. एक दिन राजा बिना किसी को बताये जंगल की ओर चला गया. वन में चलते-चलते राजा थककर निढाल हो गया, साथ ही उसे भूख और प्यास भी सताने लगी थी. तभी उसकी नजर एक सरोवर पर पड़ी. सरोवर के पास ऋषि-मुनियों का आश्रम बना हुआ था, तथा चारों तरफ यज्ञादि हो रहे थे, मुनिगण वेद का पाठ कर रहे थे. राजा सरोवर के पास पहुंचकर मुनिजनों के चरण स्पर्श किया. मुनिजनों ने राजा से यहां उपस्थित होने का कारण पूछा तो राजा ने बड़े दुःखी मन से अपनी चिंता की वजह बताया. तब एक मुनि ने बताया कि वह विश्वदेव हैं और सरोवर में स्नान करने आये हैं. उन्होंने आगे बताया कि आज पवित्रा एकादशी (पुत्रदा एकादशी) है. जो भी मनुष्य इस दिन व्रत एवं श्रीहरि की पूजा करता है उसे संतान की प्राप्ति होती है. राजा ने मुनि के बताये अनुसार उसी दिन पवित्रा एकादशी का व्रत रखा एवं श्रीहरि की पूजा-अर्चना की. कुछ ही दिनों बाद राजा को यह खुशखबरी सुनने को मिली की रानी गर्भ से हैं. निश्चित तिथि के दिन राजा को पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई. राजा ने अपने नगर वासियों से पवित्रा एकादशी की महिमा बताते हुए कहा कि जो भी मनुष्य इस तिथि को व्रत रखते हुए विष्णु जी की पूजा अर्चना करता है, उसे संतानोत्पति में आनेवाली बाधाएं दूर होती हैं तथा जीवन के अंतिम प्रहर में मोक्ष की प्राप्ति होती है.

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