Narmada Jayanti 2025: कब और कैसे हुआ नर्मदा का प्राकट्य? जानें इसका महत्व, मुहूर्त, पूजा-विधि एवं कथा इत्यादि!
हमारे देश में कई नदियां बहती हैं, इनमें से 7 बेहद पावन और महत्वपूर्ण नदियां हैं. इन्हीं में एक हैं नर्मदा नदी. शास्त्रों में नर्मदा नदी को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार माघ माह शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन अमरकंटक (मध्य प्रदेश) में मां नर्मदा की उत्पत्ति हुई थी...
Narmada Jayanti 2025: हमारे देश में कई नदियां बहती हैं, इनमें से 7 बेहद पावन और महत्वपूर्ण नदियां हैं. इन्हीं में एक हैं नर्मदा नदी. शास्त्रों में नर्मदा नदी को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार माघ माह शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन अमरकंटक (मध्य प्रदेश) में मां नर्मदा की उत्पत्ति हुई थी. इसलिए प्रत्येक वर्ष अमरकंटक जिले में नर्मदा जयंती बड़ी धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. आइये जानते हैं नर्मदा जयंती के महत्व, मुहूर्त, पूजा विधि एवं नर्मदा नदी के प्राकट्य के बारे में.. यह भी पढ़ें: VIDEO: नागपुर के प्रसिद्ध गणेश मंदिर में चढ़ाया 1,101 किलो का लड्डू, महाकुंभ की आकृति उकेरी, प्रसाद के रूप में भक्तों को किया गया वितरित
नर्मदा जयंती का महत्व
पौराणिक शास्त्रों के अनुसार जिस प्रकार गंगा नदी में स्नान करने से सभी पाप धूल जाते हैं, उसी तरह नर्मदा नदी में भी स्नान करने से मनुष्य के सारे पाप मिट जाते हैं. भगवान शिव ने नर्मदा नदी को वरदान दिया था कि नर्मदा नदी में स्नान करने से देवताओं के भी सारे पाप नष्ट हो जाएंगे. किसी व्यक्ति की कुंडली में कालसर्प दोष है, तो नर्मदा जयंती को चांदी के नाग-नागिन का जोड़ा नर्मदा नदी में प्रवाहित करने से कालसर्प दोष हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं.
नर्मदा जयंती मूल तिथि एवं मुहूर्त
माघ शुक्ल पक्ष सप्तमी प्रारंभः 04.37 AM (04 फरवरी 2025, मंगलवार)
माघ शुक्ल पक्ष सप्तमी समाप्तः 02.30 AM (05 फरवरी 2025, बुधवार)
उदया तिथि के अनुसार नर्मदा जयंती का पर्व 04 फरवरी 2025 को मनाया जाएगा.
नर्मदा जयंती पर पूजा के नियम
यूं तो मां नर्मदा की पूजा नर्मदा तट पर ही करनी चाहिए, लेकिन यह संभव नहीं हो तो घर पर स्नान के जल में गंगाजल अथवा नर्मदा नदी का जल मिलाकर स्नान कर सकते हैं. स्नान के पश्चात स्वच्छ एवं श्वेत परिधान धारण कर, पूजा स्थल के समक्ष एक चौकी रखें. इस पर गंगाजल छिड़क कर इसे शुद्ध करें, और सफेद वस्त्र बिछाएं. इस पर मां नर्मदा की प्रतिमा स्थापित करें. धूप दीप प्रज्वलित कर निम्न मंत्र का 108 जाप करते हुए पूजा प्रारंभ करें.
'ॐ नर्मदा है नमः'
माँ नर्मदा की प्रतिमा पर श्वेत पुष्प, चंदन, सफेद मिठाई एवं फल चढ़ाएं. अब नर्मदा जयंती की पौराणिक कथा का श्रवण अथवा वाचन करें. इसके पश्चात करबद्ध प्रार्थना करते हुए मां नर्मदा की पूजा-अनुष्ठान में जानें-अनजाने हुई त्रुटि के लिए क्षमा याचना करें. अंत में मां नर्मदा की आरती उतारें, एवं लोगों को प्रसाद वितरित करें.
नर्मदा जयंती की पौराणिक कथा-
स्कंदपुराण के रेवाखंड के अनुसार राजा हिरण्य तेजा अपने पितरों का तर्पण करने हेतु पृथ्वी के सभी तीर्थ स्थलों पर गए, लेकिन पितरों को मोक्ष प्राप्त नहीं हुआ, तब उन्होंने अपने पितरों से पूछा कि आपको कहां और कैसे संतुष्टि मिलेगी? पितरो ने बताया हमें माँ नर्मदा के पवित्र जल में तर्पण से मोक्ष मिल सकता है. तब पितरों के कहे अनुसार नर्मदा के उद्गम के लिए राजा हिरण्य ने 14 वर्ष तक भगवान शिव का कठोर तप किया. हिरण्य की कठिन तपस्या से प्रसन्न हो भगवान शिव ने तेजा को वरदान स्वरूप मां नर्मदा को धरती पर आने की याचना को स्वीकृति देते हुए ‘तथास्तु’ कहा, और अपनी बेटी नर्मदा को मगरमच्छ पर सवार कर विंध्याचल पर्वत पर भेजा. मान्यता अनुसार माघ शुक्लपक्ष की सप्तमी को नर्मदा पृथ्वी पर अवतरित हुईं, तब राजा ने अपने पितरों का नर्मदा तट पर तर्पण कर पितरों को मोक्ष दिलाया.