Goru Bihu 2026: असम में 'गोरु बिहू' की धूम, लखीमपुर और पूरे राज्य में पारंपरिक उत्साह के साथ मवेशियों की हुई पूजा; देखें VIDEO
असम में 14 अप्रैल, 2026 को बोहाग बिहू (रोंगाली बिहू) के पहले दिन 'गोरु बिहू' का त्योहार पारंपरिक श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है. लखीमपुर सहित पूरे राज्य में किसान अपनी कृषि में सहयोग करने वाले मवेशियों को नहलाकर और उनकी पूजा कर आभार व्यक्त कर रहे हैं.
Goru Bihu 2026: असम में वसंत ऋतु के आगमन और नए साल की शुरुआत के साथ ही सप्ताह भर चलने वाला 'बोहाग बिहू' या 'रोंगाली बिहू' उत्सव शुरू हो गया है। इस उत्सव का पहला दिन 'गोरु बिहू' के रूप में मनाया जाता है, जो पूरी तरह से राज्य के कृषि जीवन के आधार माने जाने वाले मवेशियों को समर्पित है। आज लखीमपुर और राज्य के अन्य हिस्सों से आई तस्वीरें दर्शाती हैं कि कैसे ग्रामीण समुदायों ने अपने बैलों और गायों को पवित्र नदियों और तालाबों में स्नान कराया।
गोरु बिहू के मुख्य अनुष्ठान
इस दिन की शुरुआत पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ होती है, जिसमें मवेशियों की देखभाल और उनके प्रति आभार व्यक्त किया जाता है. मुख्य परंपराओं में शामिल हैं,
असम में 'गोरु बिहू' की धूम
-
स्नान और सजावट: किसान अपने बैलों और गायों को नजदीकी जलाशयों पर ले जाकर हल्दी और उड़द दाल के पेस्ट से स्नान कराते हैं। इसके बाद उन्हें फूलों की मालाओं और नई रस्सियों से सजाया जाता है।
-
औषधीय प्रयोग: मवेशियों को दीघलती और मखियती जैसी औषधीय पत्तियों से हल्के हाथों से सहलाया जाता है। माना जाता है कि यह अनुष्ठान उन्हें साल भर बीमारियों और कीड़ों से बचाने में मदद करता है।
-
विशेष आहार: मवेशियों को कद्दू (लौकी), बैंगन और अन्य स्थानीय सब्जियां खिलाई जाती हैं, जो इस दिन की एक अनिवार्य परंपरा है। इस दौरान पारंपरिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए मवेशियों के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की जाती है।
परंपरा और आधुनिकता का मेल
लखीमपुर और गुवाहाटी जैसे शहरों में, गोरु बिहू का उत्सव विशेष रूप से जीवंत दिखाई दिया। हालांकि यह मुख्य रूप से एक ग्रामीण कृषि परंपरा है, लेकिन अब यह राज्य की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन गया है। सोशल मीडिया पर भी गोरु बिहू के वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें लोग पारंपरिक गीतों की धुन पर मवेशियों को स्नान कराते और पूजा करते हुए देखे जा रहे हैं।
बोहाग बिहू का यह पहला दिन केवल मवेशियों की सेवा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह असमिया समाज के प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव को भी दर्शाता है। यह त्यौहार सामूहिक एकता का संदेश देता है, जहाँ लोग जाति और धर्म से ऊपर उठकर एक साथ खुशियाँ साझा करते हैं। आने वाले दिनों में यह उत्सव 'मानुह बिहू' और अन्य पारंपरिक कार्यक्रमों के साथ और भी भव्य रूप ले लेगा।