Ganpat Rai Punyatithi 2023: ‘ना कोर्ट ना मुकदमा’ सीधा फांसी का फरमान! कौन था गणपत राय जिससे थर्राते थे अंग्रेज अधिकारी?
गणपत राय पुण्यतिथि (Photo: File Image)

Ganpat Rai Punyatithi 2023: स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में अनगिनत क्रांतिकारियों ने आजादी के लिए शहादत दी, कुछ नाम बहुचर्चित हुए, लेकिन ज्यादातर नाम बिसरा दिये गये, समय की धूल भी उन्हें धूमिल करती रही, लेकिन देशप्रेम की चिंगारी को ज्यादा समय तक दबाया नहीं जा सकता. ऐसी ही एक चिंगारी भड़की थी साल 1857 की क्रांति में. यह चिंगारी थी लोहरदगा (बिहार) के, गणपत राय, जिन्होंने ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव के नेतृत्व में आजादी के दीवानों के सेनापति के रूप में काम किया था और छोटा नागपुर में अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें हिला दी थीं. उनके विद्रोही तेवर और युद्धकला से बौखलाकर ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें चुपचाप फांसी के फंदे पर लटका दिया. इस महान क्रांतिकारी की 165 वीं पुण्य-तिथि (21 अप्रैल 1858) पर आइये जानते हैं, उनके जीवन की प्रेरक गाथा...यह भी पढ़ें: Basava Jayanti 2023: कौन हैं बसवन्ना? उन्होंने लिंगायत समाज की स्थापना क्यों की? जानें मंत्री से समाज सुधारक बनने की गाथा!

प्रारंभिक जीवन: पांडे गणपत राय का जन्म 17 जनवरी 1809 को बिहार (अब झारखंड) के लोहरदगा जिले के भौंरो गांव में एक कायस्थ परिवार में हुआ था. पिता रामकिशुन राय नागवंशी महाराजा जगन्नाथ शाहदेव, पालकोट के दीवान थे, और माँ सुमित्रा देवी सामान्य गृहिणी थीं. बचपन से ही वह कुशाग्र बुद्धि के थे. उनके भीतर देशभक्ति का अंकुर बाल्यावस्था में ही फूट चुका था. वह अपनी कल्पना और सोच वास्तविकता में बदलने के लिए सदा प्रयत्नशील रहते थे.

चाचा के सानिध्य में शिक्षा और शस्त्र-शिक्षा: गणपत राय के चाचा सदाशिव राय छोटा नागपुर प्रदेश के नागवंशी महाराजा जगन्नाथ शाहदेव के दीवान थे. उन्हीं के संरक्षण में गणपत राय की शिक्षा-दीक्षा, शाही महल में पूरे शानो-शौकत से हुई थी. वहीं उन्होंने उर्दू, फारसी एवं हिंदी भाषा सीखी. इसके बाद घुड़सवारी, तीर, भाला, बंदूक चलाने की कला भी विकसित की. महाराजा उनसे बहुत प्रभावित थे, इसलिए चाचा के निधन के बाद गणपत राय महाराजा के दीवान बनाये गये. गणपत राय को अंग्रेजों पर पहले से संदेह था. अंग्रेज हर काम में हस्तक्षेप करते थे. उनकी जिद जब अत्याचार में बदलने लगी, तो उन्होंने महाराजा को समझाने की कोशिश की, लेकिन राजा ने उनकी नहीं सुनी. तब गणपत राय ने दीवानी छोड़ दी.

ब्रिटिश हुकूमत के खात्मे का संकल्प: अंग्रेजों की कठपुतली बन चुके जगन्नाथ शाह को छोड़ने के बाद गणपत राय ने अंग्रेजी हुकूमत के खात्मे का संकल्प लिया. 1857 के विद्रोह में उन्होंने बड़कागढ़ स्टेट के ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव के साथ मिलकर विद्रोह कर दिया. इन लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ एक मोर्चा तैयार किया, जिसका कमांडर-इन-चीफ गणपत राय बनाये गये. बहुत जल्दी उनके संगठन में करीब 1100 लोग शामिल हो गये. इसी बीच गणपत राय ने रामगढ़ के विद्रोही सिपाहियों को संगठन में शामिल करने में कामयाबी हासिल की. इस संगठन की क्रांतिकारी गतिविधियों से घबराकर ब्रिटिश अधिकारी भाग गये. गणपत राय का लक्ष्य था पलामू जिले से होते हुए उत्तर बिहार की ओर आगे बढ़ना. यह वह इलाका था, जहां घने जंगल और पहाड़ियां थीं, जहां क्रांतिकारियों को छिपने अथवा भागने में मदद मिलती थी.

पुलिस ने रखा गणपत राय पर 500 रु का इनाम

अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों में गणपत राय अक्सर रईश अंग्रेजों को लूटकर दंडित करते थे. गणपत राय के इस कारनामे से परेशान कमिश्नर डाल्टन ने घोषणा करवाई कि जो भी व्यक्ति गणपत राय को जिंदा या मुर्दा पकड़ लिया, उसे 500 रु का इनाम मिलेगा. एक बार ब्रिटिश फौज से पीछा छुड़ाते समय गणपत रास्ता भटक गए. उस रात वह अपने एक संबंधी के घर रुके. संबंधी ने थाने में खबर कर दी थी. थानेदार ने पूरी फौज के साथ उन्हें घेरकर गिरफ्तार कर लिया. अंग्रेजों ने सारे नियम-कानून को धता बताते हुए बिना अदालत गये थाने में ही कोर्ट लगाई और अगले दिन 21 अप्रैल 1958 को तड़के फांसी पर चढ़ा दिया.