त्योहार

Baba Amte 106th Birth Anniversary: आज है बाबा आमटे की 106वीं जयंती, जानें उनके जीवन से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

आज 26 दिसंबर, 2020 को समाज सुधारक और कार्यकर्ता बाबा आमटे की 106वीं जयंती है, इन्होने कुष्ठ रोगियों की सेवा करने और इस बीमारी के कलंक को दूर करने के लिए अपना जीवन समर्पित किया. पद्म विभूषण (1986) के विजेता और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार (1985), 1949 में बाबा आम्टे ने महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में आनंदवन, एक कुष्ठ रोग देखभाल केंद्र की स्थापना की,

Baba Amte 106th Birth Anniversary: आज है बाबा आमटे की 106वीं जयंती, जानें उनके जीवन से जुड़े कुछ रोचक तथ्य
बाबा आमटे की 106वीं जयंती, (फोटो क्रेडिट्स: विकिमीडिया कॉमन्स )

आज 26 दिसंबर, 2020 को समाज सुधारक और कार्यकर्ता बाबा आमटे की 106वीं जयंती है, इन्होने कुष्ठ रोगियों की सेवा करने और इस बीमारी के कलंक को दूर करने के लिए अपना जीवन समर्पित किया. पद्म विभूषण (1986) के विजेता और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार (1985), 1949 में बाबा आम्टे ने महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में आनंदवन, एक कुष्ठ रोग देखभाल केंद्र की स्थापना की, जहां रोगियों का देखभाल किया जाता था और उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जाता था. मुरलीधर देवीदास आमटे का जन्म 26 दिसंबर, 1914 को हिंगनघाट, वर्धा में हुआ था. बाबा को उनके माता-पिता द्वारा आमटे पुकारा जाता था. बाबा आमटे का जन्म बहुत संपन्न परिवार में हुआ था. उनके पिता एक जमींदार और ब्रिटिश सरकार के अधिकारी थे. उन्होंने एक वकील के रूप में प्रशिक्षण लिया और कुछ समय तक एक अमीर युवक की तरह घुड़सवारी, शिकार, खेल पुल और टेनिस का आनंद लिया.

हालांकि, वह जल्द ही स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए, और महात्मा गांधी के साथ काम करने लगे. आनंदवन की वेबसाइट पर लिखी घटना बताती है कि कैसे एक कुष्ठ रोगी से मिलने के बाद बाबा आमटे का जीवन बदल गया - तुलसीराम की दृष्टि ने उन्हें भय से भर दिया. “बाबा ने कहा, मैं कभी भी किसी चीज से नहीं डरता था. क्योंकि मैंने एक भारतीय महिला के सम्मान को बचाने के लिए ब्रिटिश लोगों से लड़ाई लड़ी, गांधी जी ने मुझे 'अभय साधक' कहा, जिसका मतलब है, सत्य का निर्भीक साधक. यह भी पढ़ें: Google ने Doodle बनाकर किया समाजसेवी बाबा आमटे को याद, 104वीं जयंती पर दी श्रद्धांजलि

जब वरोरा के सईकफार्मियों ने मुझे गटर साफ करलिएने के चुनौती दी, तो मैंने ऐसा किया; लेकिन जब मैंने तुलसीराम की जीवित लाश देखीने तो उसने मुझमे डर पैदा किया, . बाबा आम्टे आश्वस्त थे कि कुष्ठ रोगियों की सही मायने में तभी मदद की जा सकती है जब समाज को मेंटल लेप्रोसी ’नामक बीमारी का इलाज मिल जाए - इस बीमारी से जुड़ा कलंक और डर मिटाना होगा.

इस प्रकार महारोगी सेवा समिति, वरोरा - या आनंदवन की स्थापना की गई - जहां कुष्ठ रोगियों को चिकित्सा देखभाल और सम्मानसाथ जीवन प्रदान किया गया, जो खेती और विभिन्न लघु और मध्यम उद्योगों में लगे हुए थे. बाबा आमटे की पत्नी साधनाताई आमटे ने गांव को स्थापित करने और चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यह भी पढ़ें: Dr Sheetal Amte Commits Suicide: स्वर्गीय बाबा आमटे की पोती व पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट शीतल आमटे ने की आत्महत्या

कुष्ठ रोग से जुड़े कलंक से लड़ने के लिए बाबा आमटे ने खुद को एक पाटीदार से बेसिली के साथ इंजेक्ट किया, यह साबित करने के लिए कि यह बीमारी बहुत ज्यादा संक्रामक नहीं है. बाबा आमटे अन्य सामाजिक कार्यों में भी शामिल थे. 1985 में, उन्होंने शांति के लिए पहला निट भारत मिशन (Knit India mission ) शुरू किया - 72 वर्ष की आयु में, वह कन्याकुमारी से कश्मीर तक, 3,000 मील से अधिक की दूरी पैदल तय कर भारत में एकता को प्रेरित किया. उन्होंने तीन साल बाद इस तरह का दूसरा मार्च आयोजित किया और असम से गुजरात तक 1800 मील की यात्रा की.

1990 में नर्मदा बचाओ आंदोलन में भाग लेने के लिए उन्होंने आनंद वन को छोड़ दिया और सात साल तक नर्मदा के किनारे रहे. 9 फरवरी, 2008 को बाबा आम्टे का निधन हो गया. उन्हें दफनाया गया, उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया, क्योंकि वे चाहते थे कि उनके शरीर का मृत्यु के बाद भी  उपयोग हो. “बाबा कहते थे कि उनके शरीर का हर हिस्सा किसी न किसी काम आना चाहिए. उन्होंने कहा कि दफनाने से मिट्टी में सूक्ष्म जीवों के लिए शरीर उपयोगी हो जाता है क्योंकि पानी को प्रदूषित करने वाली नदियों में राख विसर्जन होता है. इसके अलावा उन्होंने कहा था कि एक शरीर को जलाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली लकड़ी से 1,000 लोगों के लिए खाना बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

(The above story first appeared on LatestLY on Dec 26, 2020 08:56 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).