धर्म

Bhishma Dwadashi 2025: क्यों और कैसे मनाई जाती है भीष्म द्वाद्वशी? इस दिन तिल का इस्तेमाल क्यों होता है, और जानें इसका महत्व एवं पूजा-विधि!

हिंदू पंचांग के अनुसार माघ मास शुक्ल पक्ष की 12वीं तिथि को भीष्म द्वादशी का पर्व मनाया जाता है, इसे तिल द्वादशी के नाम से भी जाना है. मान्यता है कि महाभारत युद्ध में घायल होने के बाद भीष्म पितामह 58 दिनों तक बाणों की शैया पर रहे.

Bhishma Dwadashi 2025: क्यों और कैसे मनाई जाती है भीष्म द्वाद्वशी? इस दिन तिल का इस्तेमाल क्यों होता है, और जानें इसका महत्व एवं पूजा-विधि!

   हिंदू पंचांग के अनुसार माघ मास शुक्ल पक्ष की 12वीं तिथि को भीष्म द्वादशी का पर्व मनाया जाता है, इसे तिल द्वादशी के नाम से भी जाना है. मान्यता है कि महाभारत युद्ध में घायल होने के बाद भीष्म पितामह 58 दिनों तक बाणों की शैया पर रहे. उन्होंने जब देखा कि हस्तिनापुर सुरक्षित है, तब उन्होंने माघ मास की अष्टमी दिन देह त्याग दिया. इसके चौथे दिन यानी द्वाद्वशी को पाण्डवों ने भीष्म पितामह का तर्पण और पिंडदान किया था. इस दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं. मान्यता है कि इस दिन पूर्वजों का तर्पण एवं पिण्डदान करने से पूर्वज प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं. करते हैं. इस वर्ष 9 फरवरी 2025 रविवार को भीष्म द्वाद्वशी मनायी जायेगी. आइये जानें इस दिन के व्रत का महत्व, पूजा-विधि एवं अन्य जानकारियां...

क्यों मनाई जाती है भीष्म या तिल द्वादशी?

  भीष्म (तिल) द्वाद्वशी का व्रत अत्यंत फलदायी है. मूलतः यह व्रत सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु को समर्पित है. इस दिन श्रीहरि की पूजा-व्रत से लेकर तिल तर्पण और सेवन आदि के लिए तिल का विशेष रूप से इस्तेमाल किया जाता है. इस दिन तिल के दान का भी विधान है. चूंकि इसी दिन भीष्म पितामह का उनके निधन के पश्चात तिल-तर्पण किया गया था, इसलिए यह व्रत महाभारत के महान योद्धा भीष्म पितामह को समर्पित है, इसलिए इस दिन लोग अपने पूर्वजों का तिल तर्पण कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. इसी दिन जया एकादशी व्रत का पारण भी किया जाता है.

भीष्म या तिल द्वादशी पर तिल का इस्तेमाल

   भीष्म द्वादशी का दिन तिल के दान का विशेष महत्व होता है. इसके साथ-साथ इस दिन तिल का हवन एवं तिल के सेवन की भी परंपरा है. तिल-दान से मिलने वाला फल अग्निष्टोम यज्ञ के समान होता है. ज्योतिष शास्त्रियों के अनुसार इस दिन तिल के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने से जीवन में खुशहाली आती है, सफलता प्राप्त होती है और आय के विभिन्न श्रोत खुलते हैं, तथा पितृ दोष से मुक्ति मिलती है. बहुत सी जगहों पर इसे तिल द्वाद्वशी के नाम से भी मनाया जाता है.  

कैसे मनाई जाती है तिल द्वादशी?

माघ द्वादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान-ध्यान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें. भगवान विष्णु के व्रत एवं पूजा का संकल्प लें. घर के देवालय के समक्ष एक चौकी रखें, इस पर पीला वस्त्र बिछाएं. इस पर विष्णु जी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें. धूप-दीप प्रज्वलित करें. निम्न मंत्र का 108 जाप करने के पश्चात पूजा प्रारंभ करें.

'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'

भगवान विष्णु के मस्तष्क पर चावल एवं रोली का तिलक लगाएं. पुष्प अर्पित करें. तुलसी, पान, सुपारी अर्पित करें. भोग में तिल के लड्डू, फल एवं पंचामृत चढ़ाएं. अंत में भगवान विष्णु की आरती उतारें. प्रसाद वितरित करें.

 इस दिन किसी योग्य ब्राह्मण के निर्देशन पर अपने पूर्वजों के नाम तिल का अर्पण करें. ऐसा करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है. इस पूजन से पितृ-दोष से भी मुक्ति प्राप्त होती है.

(The above story first appeared on LatestLY on Feb 09, 2025 11:40 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).