क्यों पारित नहीं हुआ महिला आरक्षण विधेयक

लोकसभा और विधानसभाओं के विस्तार तथा 33 फीसदी महिला आरक्षण से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन बिल शुक्रवार को आवश्यक दो तिहाई बहुमत न मिलने के कारण लोकसभा में पारित नहीं हो सका.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

लोकसभा और विधानसभाओं के विस्तार तथा 33 फीसदी महिला आरक्षण से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन बिल शुक्रवार को आवश्यक दो तिहाई बहुमत न मिलने के कारण लोकसभा में पारित नहीं हो सका.लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के विस्तार और महिला आरक्षण से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन बिल शुक्रवार को लोकसभा में आवश्यक दो तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका. मतदान में 298 सांसदों ने बिल के पक्ष में और 230 सांसदों ने विरोध में वोट डाले, जबकि संविधान संशोधन के लिए कम से कम 352 वोटों की जरूरत होती है. इस तरह यह प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार को संसद में एक दुर्लभ हार का सामना करना पड़ा.

सरकार की ओर से पेश इस विधेयक का उद्देश्य लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण को लागू करने का रास्ता खोलना, सीटों के परिसीमन की इजाजत देना और लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर करीब 850 करना था. प्रस्ताव के अनुसार, अगले संसदीय चुनावों से पहले संसद और राज्यों की विधानसभाओं का आकार लगभग 55 प्रतिशत तक बढ़ाया जाना था. सरकार का तर्क था कि यह विस्तार 1971 की जनगणना के बाद जनसंख्या में हुए बदलाव को देखते हुए जरूरी है. फिलहाल संसदीय सीटें 1971 की जनगणना पर ही आधारित हैं.

विपक्षी दलों ने क्यों किया विरोध

विपक्षी दलों ने महिला आरक्षण के समर्थन के बावजूद इस विधेयक का विरोध किया. उनका कहना था कि महिला आरक्षण को परिसीमन और सीटों के विस्तार से जोड़कर सरकार चुनावी ढांचे में बदलाव करना चाहती है. विपक्ष के अनुसार यह कदम संवैधानिक व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करने के बराबर है. कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मतदान के तुरंत बाद एक्स पर लिखा कि यह संशोधन बिल गिर गया है और महिलाओं के नाम पर संविधान को तोड़ने की कोशिश की गई थी.

संसद में बहस के दौरान सरकार और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली. गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष पर महिला आरक्षण के खिलाफ होने का आरोप लगाया और कहा कि देश की महिलाएं इस व्यवहार को माफ नहीं करेंगी. उन्होंने सदन में कहा कि यह बिल महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा है और इसका विरोध करने वालों को राजनीतिक कीमत चुकानी होगी. बाद में एक्स पर पोस्ट में अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और समाजवादी पार्टी ने इस संविधान संशोधन को पारित नहीं होने दिया.

अभी क्यों लाया गया बिल?

सरकार का कहना है कि वह महिलाओं के लिए आरक्षण के मुद्दे पर अपनी प्रतिबद्धता से पीछे नहीं हटेगी. वहीं, विपक्ष का दावा है कि सरकार को पहले से पता था कि उसके पास दो तिहाई बहुमत नहीं है, इसके बावजूद यह बिल लाया गया. विपक्षी नेताओं के अनुसार इसका मकसद महिला आरक्षण के मुद्दे को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना और विरोधी दलों को महिलाओं के खिलाफ दिखाना था.

साल 2023 में संसद ने एक कानून पारित किया था, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने पर सहमति बनी थी. लेकिन उस कानून को अगली जनगणना और उसके आधार पर होने वाले परिसीमन से जोड़ा गया था. चूंकि जनगणना की प्रक्रिया अभी चल रही है, इसलिए उस प्रावधान के लागू होने की समयसीमा 2029 के चुनाव के बाद तक खिसक सकती थी. वर्तमान विधेयक के जरिए सरकार इस प्रक्रिया को आगे लाने का प्रयास कर रही थी.

भारत की संसद में इस समय महिलाओं की हिस्सेदारी सीमित है. लोकसभा में महिलाओं की संख्या करीब 14 प्रतिशत और राज्यसभा में लगभग 17 प्रतिशत है. राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी औसतन 10 प्रतिशत के आसपास बताई जाती है. ऐसे में महिला आरक्षण को लेकर व्यापक सहमति के बावजूद इसके तौर तरीकों पर राजनीतिक मतभेद उभर कर सामने आए.

परिसीमन को लेकर क्या है चिंता?

परिसीमन के मुद्दे ने खास तौर पर दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं को सामने रखा है. आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और तमिलनाडु में वर्तमान में लोकसभा की कुल 129 सीटें हैं, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे उत्तरी राज्यों में सीटों की संख्या लगभग बराबर है. दक्षिण के नेताओं को आशंका है कि नई जनगणना के बाद परिसीमन से उत्तर भारत की संसदीय ताकत और बढ़ सकती है, जिससे क्षेत्रीय संतुलन पर असर पड़ेगा.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने हाल के दिनों में परिसीमन को लेकर कड़ा रुख अपनाया है. उन्होंने कहा है कि यदि परिसीमन से तमिलनाडु प्रभावित होता है, तो राज्य व्यापक विरोध करेगा. विपक्ष का कहना है कि महिला आरक्षण के साथ परिसीमन को जोड़ने से इन आशंकाओं को और बल मिला.

विश्लेषकों का मानना है कि यह विधेयक भले ही पारित न हुआ हो, लेकिन आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में यह एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बना रहेगा. सरकार जहां इसे महिला अधिकारों से जुड़े अपने प्रयास के रूप में पेश करेगी, वहीं विपक्ष इसे चुनावी ढांचे में बदलाव की कोशिश बताकर आगे भी चुनौती देता रहेगा.

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