केरल की रहने वाली 38 वर्षीय नर्स निमिषा प्रिया, जो 2008 में नौकरी के लिए यमन गई थीं, अब वहां 16 जुलाई 2025 को फांसी की सजा पाने वाली हैं. उन पर 2017 में यमन के एक स्थानीय व्यापारी तालाल अब्दो महदी की हत्या का आरोप है. उनका दावा है कि वो उनसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित की जा रही थीं और उन्होंने सिर्फ पासपोर्ट वापस लेने के लिए उसे बेहोश करने की कोशिश की थी, लेकिन डोज ज्यादा हो जाने से महदी की मौत हो गई.
निमिषा प्रिया भी उन हजारों केरल की नर्सों में थीं जो खाड़ी देशों में बेहतर आमदनी के लिए जाती हैं. यमन में एक स्थानीय साझेदार के साथ उन्होंने क्लिनिक खोला, लेकिन फिर वही साझेदार उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी मुसीबत बन गया. पति और बेटी भारत लौट गए और इसके बाद निमिषा अकेली पड़ गईं.
मां की कोशिशों के बावजूद उम्मीद की कोई किरण नहीं
निमिषा की मां प्रेमा कुमारी पिछले एक साल से यमन में रह रही हैं और बेटी के लिए दया याचिका की कोशिश कर रही हैं. दिल्ली हाईकोर्ट से विशेष अनुमति लेकर वो युद्ध प्रभावित यमन पहुंचीं और अब तक कई बार जेल में बेटी से मिल चुकी हैं. भारत की ओर से हर प्रयास किया जा चुका है, लेकिन कूटनीतिक सीमाएं, हूथी शासन की हठधर्मी, और पीड़ित परिवार की सख्त रुख इस लड़ाई को और कठिन बना रहे हैं.
भारत सरकार क्या कर रही है?
भारत सरकार के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सरकार ने अब तक हर संभव रास्ता अपनाया है. एक प्रभावशाली यमनी शेख के जरिए संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन अब हालात भारत के नियंत्रण से बाहर हैं. एक आखिरी अपील सोमवार सुबह 10:30 बजे भेजी गई थी, लेकिन उसका कोई आधिकारिक जवाब नहीं आया.
क्यों नहीं काम आई 'ब्लड मनी'?
यमन में शरिया कानून के तहत, यदि हत्या के मामले में पीड़ित परिवार "ब्लड मनी" यानी मुआवजा स्वीकार कर ले, तो मौत की सजा टल सकती है. निमिषा की मां और समर्थकों ने एक बड़ा फंड जुटाया भी है, लेकिन पीड़ित परिवार ने इसे ठुकरा दिया है. उनका कहना है कि यह "सम्मान का सवाल" है.
भारत की सीमित ताकत: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा, "हम किसी विदेशी देश को कोई आदेश कैसे दे सकते हैं? कौन उसका पालन करेगा?" कोर्ट ने यह मामला 18 जुलाई तक स्थगित कर दिया है लेकिन यह भी स्पष्ट कर दिया कि भारत की संवैधानिक ताकत की सीमा अंतरराष्ट्रीय संप्रभुता से बंधी है.
क्यों नहीं है यमन से सीधा संपर्क?
मामला और जटिल इसलिए है क्योंकि यमन की राजधानी सना पर नियंत्रण रखने वाला हूथी विद्रोही गुट भारत से मान्यता प्राप्त सरकार नहीं है. भारत और हूथियों के बीच कोई औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं, इसलिए सरकार के पास सीमित कूटनीतिक विकल्प हैं.











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