क्या करेगी मोदी सरकार की फैक्ट चेक यूनिट
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

केंद्र सरकार की फैक्ट चेक यूनिट पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से ठीक पहले सरकार ने यूनिट के गठन की अधिसूचना जारी कर दी है. बॉम्बे हाई कोर्ट के एक जज ने नियमों में संशोधनों पर रोक लगा दी थी जबकि एक जज ने सही ठहराया था.यह यूनिट केंद्र सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो के तहत एक सांविधिक संस्था होगी और सोशल मीडिया पर केंद्र सरकार और उसकी एजेंसियों को लेकर जो जानकारी इसे झूठी लगेगी, इसके पास उसे चिन्हित करने की शक्ति होगी.

इस अधिसूचना के जारी होने के बाद अब यह यूनिट अगर फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर किसी जानकारी को अगर झूठी जानकारी बताती है तो वो कंपनियां उस जानकारी को हटाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होंगी.

नए नियमों का व्यापक असर

सिर्फ सोशल मीडिया कंपनियां ही नहीं, बल्कि इंटरनेट और टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडरों को भी उस जानकारी को ब्लॉक करना होगा. इस नई यूनिट और उससे जुड़े इन नियमों को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है.

कई विपक्षी पार्टियों, प्रेस संगठनों, डिजिटल अधिकार संस्थानों और डिजिटल अधिकार एक्टिविस्टों ने इन नियमों को 'ड्रेकोनियन' बताया है. 2023 में एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया समेत कई संस्थानों और स्टैंड-अप कॉमिक कुणाल कामरा ने बॉम्बे हाई कोर्ट में इस यूनिट के लिए आईटी नियमों में किए गए संशोधनों को चुनौती दी थी.

जस्टिस गौतम पटेल और न्यायमूर्ति नीला गोखले ने विभाजित फैसला दिया था. एक ने संशोधनों पर रोक लगाने के लिए कहा और एक ने संशोधनों को ठीक ठहराया. विभाजित फैसले पर अपनी राय देने के लिए एक और जज को नियुक्त किया लेकिन उन्होंने अभी तक अपना फैसला नहीं दिया है.

इस बीच याचिकाकर्ताओं ने अदालत से अपील की जब तक अंतिम फैसला नहीं आ जाता तब तब यूनिट के गठन की अधिसूचना पर रोक लगा दी जाए. लेकिन 13 मार्च को पीठ ने फैसला दिया कि अधिसूचना पर रोक नहीं लगेगी. इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की.

क्या आशंकाएं हैं

इस यूनिट से और इसके लिए आईटी नियमों में लाये गए बदलावों को लेकर एक्टिविस्टों को आशंका है कि इनकी वजह से इंटरनेट पर से किसी सामग्री को हटाने की शक्ति पूरी तरह से सरकार के पास सिमट जाएगी.

दिसंबर 2019 से इंटरनेट और सोशल मीडिया पर मौजूद सामग्री में फेक न्यूज को चिन्हित करने का काम प्रेस सूचना ब्यूरो की एक नई सेवा 'पीआईबी फैक्ट चेक' कर रही है.

लेकिन बीते तीन सालों में ऐसा कई बार देखा गया है कि 'पीआईबी फैक्ट चेक' अक्सर उन खबरों को भी फेक न्यूज बता देती है जिनमें सरकार की आलोचना की गई हो या सरकार के किसी कदम की कमियों को दिखाया गया हो.

एडिटर्स गिल्ड ने पूर्व में कहा है कि फेक न्यूज निर्धारण करने की शक्ति के सिर्फ सरकार के हाथ में होने से प्रेस की सेंसरशिप होगी. इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन का कहना है कि विशेष रूप से लोकसभा चुनावों के ठीक पहले इस यूनिट के गठन से चुनावों से जुड़ी स्वच्छंद और निष्पक्ष मीडिया कवरेज पर असर पड़ सकता है.