बिहार में बीजेपी को शिखर पर ले जाने वाले सुशील मोदी नहीं रहे
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

लालू यादव की कभी अजेय मानी जाने वाली सरकार को हटाने और बिहार में बीजेपी को शिखर पर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाने वाले सुशील मोदी का निधन हो गया है. बिहार में राजनीति में सुशील मोदी जैसी सफलता की मिसालें कम ही हैं.राजनीति के साथ-साथ वित्तीय मामलों की गंभीर समझ रखने और जिम्मेदारी को अंजाम तक पहुंचाने में माहिर बीजेपी नेता और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का सोमवार की रात दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में निधन हो गया. सुशील मोदी प्रदेश के तीसरे ऐसे राजनेता थे, जो बिहार विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा एवं राज्यसभा के सदस्य बने.

बिहार से लालू यादव की सत्ता को हटाने की लड़ाई में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई. अपनी बातों को प्रमाणित करने के लिए वे हमेशा पुख्ता दस्तावेजों के साथ प्रस्तुत होते थे, इसलिए उन्हें कागजों का डाक्टर भी कहा जाता था. उनके व्यवहार कुशलता की भी बहुत चर्चा होती है. कैंसर की बीमारी से जब तक वे पूरी तरह अशक्त नहीं हो गए, तब तक लोगों से मुलाकात का उनका सिलसिला जारी रहा. 2005 में बिहार विधानसभा की 55 सीट जीतने वाली बीजेपी को 2010 में 91 सीट वाली पार्टी बनाने में उनकी अहम भूमिका रही.

छात्र राजनीति की उपज

पांच दशक तक बिहार के राजनीतिक पटल पर छाए रहने वाले सुशील मोदी छात्र राजनीति की उपज थे. 1968 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े और आजीवन इसके सदस्य बने रहे. सुशील मोदी 1973 में पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के महासचिव चुने गए. उनके साथ ही लालू प्रसाद यादव छात्र संघ के अध्यक्ष निर्वाचित किए गए थे.

1974 में छात्र आंदोलन में प्रदेश छात्र संघर्ष समिति के सदस्य के रूप में उन्होंने बढ़-चढक़र भाग लिया. इसी साल जेपी आंदोलन में जेल गए. इमरजेंसी के दौरान 19 महीने तक वे जेल में रहे. 1977 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़ने के बाद 1983 में राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने महासचिव का पद संभाला. बीजेपी से वे 1980 में उसके गठन के समय से ही जुड़े.

व्यक्तिगत जीवन में सुशील मोदी ने काफी संघर्ष किया था. रेडिमेड कपड़ों के पैतृक व्यवसाय को संभाला, कंप्यूटर संस्थान खोला, यहां तक कि बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाया.

विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा, राज्यसभा

सुशील मोदी 1990 में पहली बार पटना सेंट्रल से विधानसभा के लिए चुने गए और फिर 1996 से 2004 तक विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे. पहली बार वर्ष 2000 में नीतीश कुमार की सात दिनों की सरकार में वे संसदीय कार्य मंत्री बने. 2004 में वे भागलपुर से चुनकर लोकसभा पहुंचे. 2005 में पार्टी ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी.

आखिर क्यों आज भी है लालू विरोध ही बिहार की राजनीति

2005 में ही जब उन्हें भाजपा विधानमंडल दल का नेता चुना गया तो उन्होंने लोकसभा से त्यागपत्र दे दिया और तब वे बिहार विधान परिषद के लिए चुने गए. इसी साल नवंबर में जब राज्य में नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) की सरकार बनी, तो वे उपमुख्यमंत्री बनाए गए. 2013 में बीजेपी के सरकार से अलग होने पर मोदी विधान परिषद में विपक्ष के नेता बने. जुलाई, 2017 में जब राज्य में फिर से एनडीए की सरकार बनी तो वे फिर उपमुख्यमंत्री बनाए गए. 2020 में वे राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित हुए.

चारा घोटाले को लेकर दायर किया पीआईएल

राजनीतिक तौर पर विरोध के बावजूद छात्र राजनीति के समय से ही लालू प्रसाद यादव से उनका अलग किस्म का ही लगाव रहा. सुशील मोदी ने आरजेडी प्रमुख पर लालू लीला नामक किताब भी लिखी. जानकार बताते हैं कि वे ही ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने चारा घोटाले को लेकर 1996 में पटना हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की थी, जिससे सीबीआई जांच का रास्ता खुला और राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप कर लालू प्रसाद को जेल जाना पड़ा. सीबीआई ने उन पर पचास से अधिक मामले दर्ज किए थे. आज भी आरजेडी प्रमुख इसके जाल में उलझे हुए हैं.

2015 में भी जब महागठबंधन की सरकार बनी तो लालू परिवार उनके निशाने पर आ गया. लालू परिवार की बेनामी संपत्ति को लेकर 2017 में मोदी ने एक बार फिर मोर्चा खोल दिया. इसे लेकर एक के बाद एक करके उन्होंने 44 प्रेस कांफ्रेंस किए. यह मामला भी अदालत में है.

11 बार पेश किया राज्य का बजट

2005 में जब एनडीए की सरकार बनी तो सुशील मोदी के पास उपमुख्यमंत्री के साथ-साथ वित्त मंत्री की भी जिम्मेदारी थी. पहली बार 2006 में उन्होंने विधानमंडल में बिहार सरकार का बजट पेश किया. 2006 से लेकर 2013 तक और फिर 2017 से 2020 तक यानी कुल मिलाकर 11 बार उन्होंने बजट पेश किया, जो एक रिकॉर्ड है. जून, 2013 से जुलाई 2017 तक बीजेपी बिहार की सत्ता से बाहर थी.

देश में जीएसटी लागू करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. 2011 में जब जीएसटी लागू किया गया तब उन्हें जीएसटी पर बनी राज्यों की कमेटी का चेयरमैन बनाया गया था. लंबे राजनीतिक करियर में सुशील मोदी का नीतीश कुमार के साथ बेहतर संबंध रहा. इसे लेकर उन पर पार्टी के ही कुछ लोगों ने समय-समय पर उंगली भी उठाई. हालांकि इस बात से ज्यादातर लोग सहमत हैं कि नीतीश कुमार उनकी वजह से ही इतने तक एनडीए में रहे और उसके बाद लौटे भी.

नीतीश कुमार कई मौकों पर यह कह चुके हैं कि 2020 में सुशील मोदी को अपनी सरकार में नहीं रख पाने का मलाल उन्हें आज भी है. कई लोगों का कहना है कि बिहार में उस वक्त भी सुशील मोदी उपमुख्यमंत्री होते तो नीतीश का एनडीए से मोहभंग नहीं होता.