सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर विधवा को दी बड़ी राहत; 50 लाख का कर्ज चुकाने के लिए अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल
सुप्रीम कोर्ट ने एक विधवा महिला के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए अपने विशेषाधिकारों का उपयोग किया है. कोर्ट ने बैंक को निर्देश दिया है कि वह महिला को कम राशि में कर्ज चुकाने की अनुमति दे और भुगतान के बाद उसकी संपत्ति के कागजात वापस कर दे.
- Read in
- English
नई दिल्ली: 'पूर्ण न्याय' सुनिश्चित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 (Article 142) के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक विधवा महिला (Widow) को बड़ी राहत प्रदान की है. महिला ने 2021 में कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान अपने पति को खो दिया था, जिसके बाद उनका व्यावसायिक कर्ज (Business Loan) विवादों में घिर गया था. भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ ने इस मामले को 'असामान्य और दुर्भाग्यपूर्ण' करार देते हुए सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को रियायती शर्तों पर समझौता करने का निर्देश दिया. यह भी पढ़ें: SC on Stray Dog: आवारा कुत्तों के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सभी राज्यों से 3 नवंबर तक जवाब देने का आदेश
क्या था पूरा मामला?
वेल्लोर जिले की निवासी सुमैया परवीन के पति 'फिल्सा लेदर्स' (FILSA Leathers) के मालिक थे. उन्होंने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया से 50 लाख रुपये की क्रेडिट सुविधा ली थी, जिसके बदले उन्होंने अपना आवासीय घर गिरवी रखा था. मई 2021 में पति के निधन तक लोन की किस्तें समय पर भरी जा रही थीं.
पति की मृत्यु के बाद व्यापार ठप हो गया और बैंक ने खाते को 'एनपीए' (NPA) घोषित कर दिया. इसके बाद बैंक ने 'सरफेसी एक्ट' (SARFAESI Act) के तहत घर को कब्जे में लेने की कार्यवाही शुरू कर दी. बैंक ने जनवरी 2024 में 71 लाख रुपये के कुल बकाया के बदले 34.69 लाख रुपये का वन-टाइम सेटलमेंट (OTS) ऑफर दिया था, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण महिला समय पर पूरी राशि जमा नहीं कर पाई.
मद्रास हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक की कानूनी जंग
जब महिला बकाया राशि चुकाने में विफल रही, तो बैंक ने ओटीएस रद्द कर दिया और उच्च राशि की मांग की. महिला ने मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन हाईकोर्ट ने बैंक की मांग को कानूनी रूप से सही बताते हुए राहत देने से इनकार कर दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
सुनीवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यद्यपि बैंक की मांग कानूनी रूप से सही है, लेकिन इसे सख्ती से लागू करने से याचिकाकर्ता को 'अत्यधिक कठिनाई' होगी. यह भी पढ़ें: AI के बढ़ते दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर, राष्ट्रीय रेगुलेटरी बॉडी बनाने की मांग
सुप्रीम कोर्ट का मानवीय फैसला
न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने 'न्याय के हित' में निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- राहत राशि: कोर्ट ने महिला को निर्देशित किया कि वह पहले से जमा 46 लाख रुपये के अलावा 33 लाख रुपये और जमा करे.
- समय सीमा: इस राशि को जमा करने के लिए महिला को 8 सप्ताह का समय दिया गया है.
- दस्तावेजों की वापसी: भुगतान होने के बाद बैंक को 'नो ड्यूज सर्टिफिकेट' जारी करना होगा और घर के असली कागजात महिला को लौटाने होंगे.
- ब्याज पर रोक: राशि जमा करने पर आगे के किसी भी ब्याज पर रोक लगा दी गई है.
अनुच्छेद 142: 'पूर्ण न्याय' की शक्ति
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल इस मामले के विशिष्ट तथ्यों और मानवीय संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए पारित किया गया है. कोर्ट ने इसे एक "मिसाल" (Precedent) न मानने की चेतावनी दी, ताकि भविष्य में अन्य मामलों में बैंक के खिलाफ इसका गलत उपयोग न किया जा सके.
(The above story first appeared on LatestLY on Jan 27, 2026 08:12 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

