पैसों से ऊपर है ममता और देखभाल, हाई कोर्ट ने अमीर पिता की जगह मां को दी बच्चे की कस्टडी
Representational Image | File

जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि बच्चे की कस्टडी (हिरासत) के मामलों में सिर्फ पिता की आर्थिक स्थिति के आधार पर मां को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता. जस्टिस जावेद इकबाल वानी ने स्पष्ट किया कि बच्चे के कल्याण के लिए केवल बेहतर आर्थिक साधन ही पर्याप्त नहीं हैं. भावनात्मक जुड़ाव, देखभाल की निरंतरता और स्थिर माहौल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं.

तलाक के बाद भी मुस्लिम महिला को मिलेगा गुजारा भत्ता, पटना हाई कोर्ट का अहम फैसला.

कोर्ट ने कहा कि छोटे बच्चों के पालन-पोषण में मां की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. भारतीय अदालतों ने कई बार माना है कि नन्हे बच्चों के लिए मां का स्नेह और देखभाल बेशकीमती होती है. जब तक मां का आचरण बच्चों के हित के खिलाफ न हो, उसकी कस्टडी छीनना सही नहीं है.

कलकत्ता हाई कोर्ट ने रद्द की पत्नी की शिकायत, कहा- जिम्मेदारियों को क्रूरता कहना गलत.

पिता की आर्थिक श्रेष्ठता पर कोर्ट का सवाल

सिरीनगर की निचली अदालत ने पहले पिता को कस्टडी देने का आदेश दिया था, यह कहते हुए कि वह बच्चों को बेहतर जीवनस्तर दे सकते हैं. लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि सिर्फ बेहतर आय का मतलब यह नहीं कि पिता ही बेहतर अभिभावक होंगे. मां का अपनी सीमित आय के बावजूद खुद का व्यवसाय है और वह अपने माता-पिता के साथ रह रही हैं, जिससे बच्चों को अतिरिक्त देखभाल और प्यार मिलेगा.

कतर से जुड़ा विवाद और मां की सुरक्षा का तर्क

कोर्ट ने यह भी माना कि मां ने कतर छोड़कर बच्चों के साथ कश्मीर लौटने का जो फैसला लिया, उसके पीछे वजह थी. पिता को पहले कतर की एक अदालत ने घरेलू हिंसा के मामले में दोषी ठहराया था. कोर्ट ने माना कि मां अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित थी, इसलिए उसने उन्हें अपने पास रखने का फैसला किया.

बच्चों की इच्छा और संवेदनशीलता

हाईकोर्ट ने 7 साल के बड़े बच्चे से व्यक्तिगत बातचीत का भी हवाला दिया. जब उससे पूछा गया कि अगर वह मां के बिना कतर जाए तो उसकी देखभाल कौन करेगा, तो उसने झिझकते हुए कहा, "शायद एक नौकरानी." कोर्ट ने कहा कि यह प्रतिक्रिया बच्चों के मन में मां के स्नेह की आवश्यकता को दर्शाती है.

इस्लामिक कानून और संवैधानिक मूल्यों का संतुलन

पिता ने दावा किया था कि इस्लामी कानून के अनुसार एक निश्चित उम्र के बाद मां को बेटे की कस्टडी का अधिकार नहीं होता. लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान लैंगिक समानता का पक्षधर है, और केवल लिंग के आधार पर मां से उसका अधिकार छीनना न्याय नहीं होगा.

स्थिर वातावरण से हटाना बच्चों के हित में नहीं

कोर्ट ने कहा कि 2022 से बच्चे अपनी मां के साथ कश्मीर में रह रहे हैं, स्कूल जा रहे हैं और एक स्थिर जीवन बिता रहे हैं. अचानक उन्हें इस माहौल से अलग करना उनके भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा. इसलिए मां को कस्टडी बरकरार रखने की अनुमति दी गई, जबकि पिता को मुलाकात का अधिकार दिया गया.