तलाक के बाद भी मुस्लिम महिला को मिलेगा गुजारा भत्ता, पटना हाई कोर्ट का अहम फैसला
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पटना हाई कोर्ट (Patna High Court) ने एक अहम फैसले में कहा है कि मुस्लिम महिला तलाक के बाद भी गुजारा भत्ता (Maintenance) की हकदार है, अगर पति ने ‘इद्दत’ अवधि के दौरान उसके भविष्य के लिए कोई उचित और न्यायसंगत प्रावधान नहीं किया है. यह फैसला जस्टिस जितेंद्र कुमार की बेंच ने सुनाया. कोर्ट ने एक मुस्लिम व्यक्ति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने दावा किया था कि उसका विवाह पारस्परिक सहमति (Mutual Consent) से समाप्त हो चुका है.

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महिला ने अपने आवेदन में बताया कि शादी के कुछ समय बाद ही उसे पति और ससुराल वालों की क्रूरता झेलनी पड़ी, जिससे मजबूर होकर उसे अपने मायके लौटना पड़ा. उसके पास कोई आय का स्रोत नहीं था और उसने 15,000 रुपये मासिक गुजारा भत्ते की मांग की. उसने यह भी बताया कि उसका पति विदेश में काम करता है और लगभग 1 लाख रुपये महीना कमाता है.

पति का तर्क: पहले ही दे चुका हूं रकम

पति ने कोर्ट में कहा कि 2013 में ‘मुबारत’ (पारस्परिक तलाक) के जरिए उनका विवाह समाप्त हो चुका था. उसने दावा किया कि वह पहले ही 1,00,000 रुपये बतौर मेहर, तलाक और इद्दत खर्च के रूप में दे चुका है, इसलिए और कोई भुगतान करने की जरूरत नहीं है.

फैमिली कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों ने खारिज किए दावे

फैमिली कोर्ट ने पति के तर्क को खारिज करते हुए उसे 7,000 रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया. इस पर पति ने हाई कोर्ट में याचिका डाली. लेकिन हाई कोर्ट ने भी फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार रखा. जस्टिस कुमार ने कहा कि आपसी सहमति से हुए तलाक के दावे को उचित सबूतों से साबित करना जरूरी है. उन्होंने यह भी कहा कि धारा 125 CrPC के तहत ऐसे विवादित तथ्यों पर फैसला नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह प्रक्रिया सारांश (Summary) प्रकृति की है.

तलाक मान भी लें, तब भी पत्नी हकदार

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही तलाक को मान लिया जाए, फिर भी पत्नी को गुजारा भत्ता मिलेगा. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों शाह बानो केस (1985) और दानियल लतीफी केस (2001) का हवाला देते हुए कहा कि CrPC की धारा 125 धर्मनिरपेक्ष है और किसी भी धर्म या पर्सनल लॉ से टकराती नहीं है. मुस्लिम पति पर तलाकशुदा पत्नी को गुजारा भत्ता देने की जिम्मेदारी बनी रहती है, अगर वह खुद को संभालने में असमर्थ है.