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SC on POCSO Case: नाबालिग लड़की से बनाए संबंध, पॉक्सो एक्ट के तहत मिली 10 साल कैद की सजा; सुप्रीम कोर्ट ने दोषी को किया बरी

सुप्रीम कोर्ट ने प्यार और कानून के बीच संतुलन बनाते हुए बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने एक ऐसे युवक को राहत दी है, जिसे नाबालिग लड़की से संबंध बनाने के आरोप में पॉक्सो एक्ट के तहत 10 साल कैद की सजा सुनाई गई थी.

SC on POCSO Case: नाबालिग लड़की से बनाए संबंध, पॉक्सो एक्ट के तहत मिली 10 साल कैद की सजा; सुप्रीम कोर्ट ने दोषी को किया बरी
SC on POCSO Case (Photo : X)

SC on POCSO Case: सुप्रीम कोर्ट ने प्यार और कानून के बीच संतुलन बनाते हुए बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने एक ऐसे युवक को राहत दी है, जिसे नाबालिग लड़की से संबंध बनाने के आरोप में पॉक्सो एक्ट के तहत 10 साल कैद की सजा सुनाई गई थी. यह मामला एक प्रेम संबंध से जुड़ा था, जो अब शादी और पारिवारिक रिश्ते में बदल गया था. अदालत ने कहा कि यह अपराध वासना का नहीं, बल्कि प्रेम का परिणाम था. इसलिए न्याय के नाम पर कठोरता नहीं दिखाई जा सकती.

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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

जस्टिस दीपांकर दत्ता और ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि आरोपी तकनीकी रूप से दोषी है, लेकिन अब चूंकि दोनों विवाहित हैं और एक बच्चे के माता-पिता हैं, इसलिए उसे सजा देना न्याय की भावना के खिलाफ होगा. अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए युवक को बरी कर दिया.

SC ने बताया कि कानून के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति ऐसे जघन्य अपराध का दोषी पाया जाता है, तो उसके और उसकी पत्नी के बीच समझौते के आधार पर वर्तमान मामले में कार्यवाही को रद्द नहीं किया जा सकता. लेकिन अपीलकर्ता की पत्नी की 'करुणा और सहानुभूति की पुकार' को नजरअंदाज करना न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करेगा.

SC ने आरोपी पति पर लगाई शर्त

अदालत ने टिप्पणी की है कि अगर पति को जेल हुई, तो सबसे ज्यादा तकलीफ उसकी पत्नी और बच्चे को होगी. पीड़िता ने खुद अदालत से गुहार लगाई थी कि उसे अपने पति के साथ शांतिपूर्वक जीवन जीने की इजाजत दी जाए.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पति पर एक शर्त भी लगाई. वह न तो अपनी पत्नी और न ही बच्चे को छोड़ेगा और न ही उनकी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ेगा. अगर वह भविष्य में अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ता है, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है.

'संवेदनशीलता-व्यावहारिकता का संतुलन जरूरी'

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि किशोरावस्था में प्रेम संबंधों को अपराध नहीं माना जाना चाहिए, खासकर जब युगल सहमति से विवाह कर लेते हैं. अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में "संवेदनशीलता और व्यावहारिकता का संतुलन" जरूरी है. ताकि एक निर्दोष परिवार का भविष्य बर्बाद न हो.

(The above story first appeared on LatestLY on Nov 01, 2025 04:10 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).