Soundala Village: महाराष्ट्र के सौंदाळा गांव ने रचा इतिहास, खुद को घोषित किया 'जाति-मुक्त', ग्रामसभा में 'मानवता' को माना एकमात्र धर्म
सौंदला जाति मुक्त गांव (Photo Credits: X\@MBtheguide)

मुंबई/अहिल्यानगर: महाराष्ट्र (Maharashtra) के अहिल्यानगर (पूर्व में अहमदनगर) जिले (Ahilyanagar District) के सौंदाळा गांव (Soundala Village) ने सामाजिक एकता की एक मिसाल पेश की है। 5 फरवरी 2026 को हुई एक विशेष ग्रामसभा में, ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से गांव को 'जाति-मुक्त' (Caste-Free) घोषित करने का क्रांतिकारी प्रस्ताव पारित किया. इस निर्णय का उद्देश्य दैनिक जीवन से जातिगत पहचान और भेदभाव (Caste-Based Discrimination and Identity) को पूरी तरह समाप्त करना है. यह भी पढ़ें: Maharashtra: अहमदनगर रेलवे स्टेशन का नाम बदला, अब इस नाम से जाना जाएगा

'मेरी जाति मानवता है': प्रस्ताव की मुख्य बातें

ग्रामसभा ने भारत के संविधान और उसकी प्रस्तावना (Preamble) की शपथ लेते हुए समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों को सर्वोच्च माना. प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से कहा गया है:

  • मानवता ही धर्म: अब से गांव का कोई भी निवासी जातिगत प्रथाओं का पालन नहीं करेगा। "मेरी जाति मानवता है" को ही जीवन का आधार माना जाएगा.
  • सार्वजनिक सुविधाओं तक समान पहुंच: स्कूल, मंदिर, सामुदायिक भवन, कुएं और श्मशान घाट बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए खुले रहेंगे.
  • सोशल मीडिया पर नजर: समाज को बांटने वाली या जातिगत विद्वेष फैलाने वाली किसी भी सोशल मीडिया पोस्ट पर प्रतिबंध लगाया गया है। उल्लंघन करने वालों पर ग्राम पंचायत दंडात्मक कार्रवाई करेगी.

समाज सुधारकों से मिली प्रेरणा

सरपंच शरद आरगडे द्वारा पेश किए गए इस प्रस्ताव को ग्रामीण बाबासाहेब भोडक ने समर्थन दिया. सरपंच आरगडे के अनुसार, यह कदम डॉ. बी.आर. अंबेडकर, महात्मा जोतिबा फुले, छत्रपति शाहू महाराज, छत्रपति शिवाजी महाराज और महात्मा गांधी जैसे महान समाज सुधारकों के विचारों से प्रेरित है.

सौंदाळा: प्रगतिशील निर्णयों का केंद्र

यह पहली बार नहीं है जब सौंदाळा गांव अपने सुधारों के लिए चर्चा में है। इससे पहले भी इस गांव ने कई साहसिक निर्णय लिए हैं:

  1. गाली-गलौज पर जुर्माना: गांव में माता-बहनों के नाम पर गाली देने पर ₹500 का जुर्माना लगाया जाता है.
  2. विधवा विवाह को प्रोत्साहन: विधवा महिलाओं के पुनर्विवाह और उन्हें सामाजिक कार्यक्रमों में सम्मान दिलाने के लिए गांव लगातार काम कर रहा है.
  3. डिजिटल अनुशासन: बच्चों की पढ़ाई के लिए शाम के समय मोबाइल के उपयोग पर प्रतिबंध जैसे नियम भी यहां लागू हैं.

भविष्य की राह

सामाजिक कार्यकर्ता प्रमोद झिंझाडे के मार्गदर्शन में शुरू हुई यह पहल अब महाराष्ट्र के अन्य गांवों के लिए भी प्रेरणा बन रही है. सरपंच का कहना है कि यह नियम किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं करते, बल्कि संवैधानिक मूल्यों को जमीनी स्तर पर मजबूत करते हैं. सौंदाळा का यह 'प्रोग्रेसिव मॉडल' आज के दौर में ग्रामीण भारत के लिए एकता और समरसता का एक नया रास्ता दिखा रहा है.