दुनिया भर में अमेरिकी तख्ता पलट की कोशिशों का दागदार इतिहास
कई अमेरिकी राष्ट्रपति विदेशों में अलोकप्रिय शासकों को हटाने के लिए पहले भी सैन्य बल भेज चुके हैं.
कई अमेरिकी राष्ट्रपति विदेशों में अलोकप्रिय शासकों को हटाने के लिए पहले भी सैन्य बल भेज चुके हैं. ट्रैक रिकॉर्ड मिला जुला रहा है. ईरान युद्ध के शुरु में ट्रंप ने दावा किया था कि उनका एक लक्ष्य ईरान में सत्ता परिवर्तन था.ईरान के साथ मौजूदा युद्ध की शुरुआत में, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अपने उद्देश्यों को लेकर साफ थे. तेहरान को न तो परमाणु और न ही पारंपरिक सैन्य खतरा पैदा करने की हालत में होना चाहिए, और कमजोर हुए मुल्ला शासन सत्ता को सत्ता से हटा दिया जाना चाहिए.
उसके बाद से, ट्रंप और दूसरे वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान पर हवाई हमलों के लिए अलग-अलग कारण बताए हैं. अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने सोमवार को यहां तक कहा कि वर्तमान संघर्ष "कथित सत्ता-परिवर्तन का युद्ध नहीं है.” लेकिन अमेरिकी इतिहास को देखते हुए, हैरानी नहीं होगी अगर ट्रंप का मूल तर्क ही मौजूदा सैन्य हस्तक्षेप के प्रेरक कारकों में से एक हो. आखिरकार, अमेरिका का तथाकथित "तख्ता पलट” अभियानों को लेकर किसी भी अन्य देश से ज्यादा अनुभव है.
2019 के एक अध्ययन के अनुसार, केवल शीत युद्ध (1947–1989) के दौरान ही, अमेरिका ने विदेशों में सत्ता संतुलन अपने पक्ष में बदलने के लिए 72 प्रयास किए थे. इनमें से 64 मामले अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के जासूसी अभियान थे, जिनकी सफलता दर लगभग 40 प्रतिशत रही थी.
उदाहरण के लिए, 1953 में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने ब्रिटिश एमआई6 के साथ मिलकर ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को सत्ता से हटा दिया था. इसके कारण ईरान के नए शासक शाह मोहम्मद रजा पहलवी को "अमेरिका की कठपुतली” के रूप में देखा जाने लगा और 1979 की इस्लामी क्रांति में उनको सत्ता से बेदखल कर गया. उस समय स्थापित हुई धार्मिक और अधिक दमनकारी सत्ता आज हवाई हमलों के केंद्र में है.
एक सफल दिखने वाला सत्ता-परिवर्तन अभियान भी लंबे समय में नई समस्याएं पैदा कर सकता है. अमेरिका से जुड़े कुछ खुफिया और कुछ खुलेआम हुए सत्ता परिवर्तन अभियानों पर एक नजर.
लीबिया (2011)
2011 में जब अरब वसंत के दौरान उत्तरी अफ्रीका में बदलाव की उम्मीदें जगी थी, तब लीबिया में लंबे समय से शासन कर रहे मुअम्मर अल-गद्दाफी के खिलाफ भी प्रतिरोध बढ़ा था. अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के नेतृत्व में अमेरिका ने तुरंत विरोधी पक्ष के नेशनल ट्रांजिशनल काउंसिल का साथ दिया था.
अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने जल्द ही नाटो के ऑपरेशन यूनिफाइड प्रोटेक्टर के तहत हवाई हमले शुरू कर दिए थे. उसी साल अक्टूबर में, एक अमेरिकी ड्रोन और फ्रांसीसी लड़ाकू विमान ने गद्दाफी के काफिले पर हमला बोल दिया था, जिसके बाद नेशनल ट्रांजिशनल काउंसिल के लड़ाकों ने उन्हें मार दिया था.
लगभग 15 साल बाद लीबिया आज भी राजनीतिक रूप से विभाजित और अस्थिर है.
इराक (2003)
1 मई 2003 को तानाशाह सद्दाम हुसैन के पतन के कुछ ही हफ्ते बाद, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने इराक युद्ध के अंत की घोषणा की थी. अमेरिकी नौसेना के विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन पर लगे बैनर पर लिखा था "मिशन पूरा हुआ.” बुश ने कहा था, "तानाशाही से लोकतंत्र में बदलाव आने में समय तो लगेगा, लेकिन यह एक जरूरी प्रयास है. हमारा गठबंधन तब तक बना रहेगा जब तक यह काम पूरा नहीं हो जाता. उसके बाद हम वापस लौट जाएंगे और अपने पीछे एक स्वतंत्र इराक को छोड़कर जाएंगे.”
हालांकि, इसके बाद के कब्जे वाले दौर में भी न तो शांति आई और न ही स्थिरता. सरकारी संस्थाएं कमजोर रहीं, और पड़ोसी ईरान ने स्थानीय शिया मिलिशिया का समर्थन किया, जो सुन्नी गुटों के साथ हिंसक झड़पों में उलझे रहे. सत्ता के शून्य के बीच तथाकथित "इस्लामिक स्टेट" आतंकी संगठन बना और एक शक्तिशाली खिलाड़ी के रूप में उभरा, जिसने इराक, सीरिया और पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया.
अमेरिकी इतिहासकार जोसेफ स्टीब के अनुसार, अमेरिकी लोग इस गलतफहमी में थे कि ऐसे माहौल में उदार लोकतंत्र अपने आप फल-फूल जाएगा. स्टीब ने कहा, "उनका मानना था कि इराक जैसे शासन को गिराने के बाद उन्हें बदलना अपेक्षाकृत आसान होगा.”
अफगानिस्तान (2001)
इराक पर हमला जॉर्ज डब्ल्यू बुश का इकलौता "सत्ता-परिवर्तन” युद्ध नहीं था. 11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमलों के चार हफ्ते बाद, अमेरिका ने "ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम” शुरू किया था. तालिबान शासन को जल्द ही बेदखल करने के बाद भी अमेरिका समर्थित सरकार लंबे समय तक टिक नहीं पाई.
2014 में जर्मनी सहित अंतरराष्ट्रीय सेनाओं के अपने सैनिकों की संख्या घटाने के बाद, तालिबान ने धीरे-धीरे खोई जमीन वापस पाना शुरू कर दिया. अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप ने अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष में तालिबान से बचे हुए अमेरिकी सैनिकों की वापसी का समझौता किया और बदले में उन पर हमला न करने का वादा किया. लेकिन 2021 में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के शासन के दौरान अंतिम सैनिकों की वापसी के तुरंत बाद तालिबान ने पूरे देश पर फिर से नियंत्रण स्थापित कर लिया और अमेरिकी हमले से पहले की राजनीतिक व्यवस्था को बहाल कर दिया.
पनामा (1989)
1980 के दशक में पनामा में तानाशाह मानुएल नोरिएगा का शासन था. सालों तक सीआईए से पैसा लेते रहने के बाद, नोरिएगा अमेरिकी सरकार के लिए बोझ बन गया था. उसके शासन में पनामा ड्रग्स की तस्करी का अड्डा था, और अमेरिका को डर था कि पनामा नहर के विस्तार में उसे दरकिनार कर दिया जाएगा. 1980 के दशक में अमेरिका के साथ नोरिएगा के रिश्ते बिगड़ते गए.
मई 1989 में विपक्षी नेता गिल्येर्मो एंदारा ने चुनाव जीता, लेकिन नोरिएगा ने चुनावी नतीजों को मानने से इनकार कर दिया. आखिरकार दिसंबर में तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश ने नोरिएगा को सत्ता से हटाने के लिए "ऑपरेशन जस्ट कॉज” का आदेश दे दिया. पनामा पर हमले के बाद नोरिएगा को पकड़ लिया गया और अमेरिका ले जाया गया और मुकदमा चलाया गया. बाद में उन्होंने अमेरिका, फ्रांस और पनामा में अलग-अलग जेलों में सजा काटी और 2017 में उनकी मौत हो गई. इस अमेरिकी सैन्य अभियान की कीमत 33.1 करोड़ डॉलर बताई गई.
ग्रेनेडा (1983)
1979 से कैरेबियाई देश ग्रेनेडा ने अपनी राजनीति सोवियत संघ के साथ तेजी के साथ जोड़ दिया. जब प्रधानमंत्री मॉरिस बिशप ने अमेरिका को खुश करने की कोशिश की, तो उन्हें सैनिक गुटों ने गद्दी से हटा दिया और उनकी हत्या कर दी. इस पृष्ठभूमि में, अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने कई कैरेबियाई देशों के समर्थन से ग्रेनेडा पर आक्रमण कर दिया था.
हालांकि, ब्रिटेन ने इसका कड़ा विरोध किया था. वह कॉमनवेल्थ सदस्य ग्रेनेडा को अपने प्रभावक्षेत्र में मानता था. अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद, एक ब्रिटिश गवर्नर ने 1984 में वहां सत्ता परिवर्तन और चुनावों की देखरेख की थी.
डोमिनिकन रिपब्लिक (1965)
कई तख्तापलटों के बाद, 1965 में डोमिनिकन रिपब्लिक गृहयुद्ध की कगार पर था. राष्ट्रपति लिंडन बी जॉनसन ने अमेरिकी देशों के संगठन (OAS) के वोट के बाद, सैन्य आक्रमण कर दिया था. इसका आधिकारिक उद्देश्य अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा था. लेकिन, अनौपचारिक तौर पर इसका लक्ष्य शीत युद्ध के दरम्यान अमेरिका के पड़ोस में स्थित डोमिनिकन रिपब्लिक को एक समाजवादी राज्य यानि की "दूसरा क्यूबा" बनने से रोकना था.
वहां तैनात 44,000 सैनिकों की मदद से अमेरिका ने ये सुनिश्चित किया कि उसके पसंदीदा सरकार प्रमुख ने सत्ता संभाली.
वेनेजुएला (2026)
सबसे हालिया संभावित "सत्ता परिवर्तन” का ऑपरेशन इतना नया है कि इसका अंतिम मूल्यांकन अभी मुमकिन नहीं है. जनवरी 2026 की शुरुआत में, राष्ट्रपति ट्रंप ने एक सैनिक ऑपरेशन के जरिए वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो के अपहरण को अंजाम दिया. मादुरो पर न्यूयॉर्क में "ड्रग टेररिज्म” का मुकदमा चलाया जाएगा.
वेनेजुएला में उनकी सहयोगी उप राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज अब सत्ता के शीर्ष पर बैठी हैं. मादुरो की सत्ता का हिस्सा होने के बावजूद ट्रंप ने घोषणा की है कि वह रोड्रिगेज के साथ सहयोग करेंगे. बदले में अमेरिका को वेनेजुएला के विशाल तेल भंडारों तक पहुंच मिलेगी.
हालांकि, 2025 की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और ट्रंप समर्थक मारिया कोरीना मचाडो ने वेनेजुएला लौटने और लोकतंत्र की राह पर उसका नेतृत्व करने की इच्छा जताई है. अमेरिका के सैन्य हमले के दो महीने बाद भी वेनेजुएला का भविष्य अनिश्चित है.
यह लेख मूल रूप से जर्मन में प्रकाशित हुआ था.
(The above story first appeared on LatestLY on Mar 06, 2026 12:00 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

