केजरीवाल का पत्र और न्यायपालिका की साख का संकट!
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच के सामने पेश न होने संबंधी फैसले ने न्यायपालिका की साख और उसके राजनीतिकरण पर एक नई बहस छेड़ दी है. कानूनी जानकार इसे किस तरह देखते हैं?दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि आबकारी मामले की सुनवाई कर रही दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायाधीश, जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच के सामने न तो वो खुद उपस्थित होंगे और न ही उनके वकील दलील पेश करने जाएंगे. अरविंद केजरीवाल ने इस बारे में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को एक पत्र भी लिखा है और सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी पोस्ट किया है.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को लिखे पत्र में अरविंद केजरीवाल ने कहा है, "इस पत्र को लिखने का मेरा एकमात्र उद्देश्य न्यायपालिका को मजबूत करना है, उसे कमजोर होने से बचाना है. मेरी अंतरात्मा में अब मैं उस स्थिति पर पहुंच गया हूं जहां मैं इन कार्यवाहियों में भाग नहीं ले सकता. मेरा विरोध हाईकोर्ट या न्यायिक व्यवस्था से नहीं है, बल्कि केवल इस मामले के आपके सामने जारी रहने से है, जहां गंभीर और अनसुलझे सवालों के कारण आपकी निष्पक्ष न्याय देने की क्षमता पर सार्वजनिक संदेह पैदा हुआ है.”

चार पन्नों के इस पत्र को अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर भी पोस्ट किया है. केजरीवाल ने अपने इस फैसले का एक मुख्य कारण जस्टिस स्वर्णकांता के 20 अप्रैल के उस आदेश को बताया, जिसमें जस्टिस शर्मा ने उनकी रिक्यूजल याचिका खारिज कर दी थी. केजरीवाल का कहना है कि इससे आगे की सुनवाई की निष्पक्षता पर उनका भरोसा खत्म हो गया है.

इससे पहले, आबकारी नीति मामले की सुनवाई कर रहीं जस्टिस स्वर्णकांता की अदालत में व्यक्तिगत तौर पर पेश होकर अरविंद केजरीवाल ने उनसे अपील की थी कि वो इस सुनवाई से खुद को अलग कर लें. अरविंद केजरीवाल की दलील थी कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ऐसे कार्यक्रमों में गई हैं जो आरएसएस के समर्थक हैं और उनके दो बेटे भारत सरकार के लाभार्थी हैं.

इस बात का जिक्र अरविंद केजरीवाल ने पत्र में भी किया है. उन्होंने लिखा है, "पूर्व जस्टिस अभय एस ओका ने हाल ही में कहा था कि यदि उन्हें अधिवक्ता परिषद ने आमंत्रित किया होता, तो वह इसे विनम्रता से ठुकरा देते क्योंकि उनके अनुसार इस संगठन का राजनीतिक झुकाव है.”

केजरीवाल को आपत्ति क्यों है?

उन्होंने आगे लिखा है, "सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता इस मामले में दूसरी तरफ के वकील हैं. तुषार मेहता आपके दोनों बच्चों को केस देते हैं जिन्हें 2023 से 2025 के बीच करीब 5,904 केस मिले. यदि जज के बच्चों का भविष्य सॉलिसिटर जनरल तय कर रहे हैं तो क्या जज साहिबा उनके खिलाफ फैसला सुना पाएंगी.”

दरअसल, दिल्ली हाईकोर्ट की जज, जस्टिस स्वर्णकांता के दोनों बच्चे केंद्र सरकार के वकील के पैनल का हिस्सा हैं और अरविंद केजरीवाल का कहना है कि इसमें साफ तौर पर हितों का टकराव दिखता है.उधर, इस मामले में एक अन्य अभियुक्त और दिल्ली के पूर्व उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भी जस्टिस स्वर्णकांता की बेंच के सामने पेश होने से इनकार कर दिया है.

हालांकि किसी जज का किसी खास मामले की सुनवाई से खुद अलग हो जाना या फिर किसी पक्ष का किसी खास जज की बेंच में उसके मुकदमे की सुनवाई न करने की अपील करना न तो कोई गलत है और न ही गैर-कानूनी. बल्कि यह एक कानूनी प्रक्रिया है. लेकिन इस मामले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. सवाल न सिर्फ न्यायपालिका की साख पर हैं बल्कि सवाल ये भी है कि क्या ऐसा करके केजरीवाल और सिसोदिया ने न्यायपालिका की अवमानना की है.

अदालत की अवमानना

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील दुष्यंत पाराशर कहते हैं कि अरविंद केजरीवाल ने किसी तरह की अवमानना नहीं की है बल्कि उन्होंने तो बाकायदा बिंदुवार कारण बताए हैं कि वो क्यों उनकी बेंच में ये मुकदमा नहीं चलने देना चाहते हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में दुष्यंत पाराशर कहते हैं, "केजरीवाल ने बिंदुवार जो कारण बताए हैं, उनमें साफ कहा है कि हम इस वजह से आप के फैसले पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं. उन्होंने माननीय न्यायाधीश पर कोई आरोप नहीं लगाया है. दरअसल, ये न्यायपालिका के उसी आदर्श को मजबूत करता है जिसमें कहा जाता है कि न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए.”

दुष्यंत पाराशर इस पूरे प्रकरण को न्यायपालिका की प्रतिष्ठा के लिए भी ठीक नहीं मानते. उनका कहना है कि ऐसे हजारों उदाहरण हैं जब जज ऐसे मामलों से खुद ही अलग हो जाते हैं. उनके मुताबिक, "कई बार तो जज अपने बारे में बताते हुए दोनों पक्षों के वकीलों से उनकी सहमति लेते हैं कि उन्हें कोई आपत्ति तो नहीं है.”

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इलाहाबाद हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता कमल कृष्ण रॉय का भी कहना है कि इस मामले में न्यायालय की अवमानना का कोई मामला तो बनता ही नहीं है. डीडब्ल्यू से बातचीत में कमल कृष्ण रॉय कहते हैं, "अवमानना का तो कोई मामला ही नहीं है. उन्होंने ये नहीं कहा कि आप ईमानदार नहीं हैं. उन्होंने तो सिर्फ ये कहा है कि आपके बेटे भारत सरकार के बेनिफिशियरी हैं, आप खास विचारधारा के कार्यक्रमों में जाती हैं. कंटेंप्ट तो तब होता जब मोटिव पर सवाल उठाते और कहते कि आप बेईमानी करेंगी. ये तो कह रहे हैं कि हमें शक है कि हमें न्याय नहीं मिल पाएगा.”

तरीका ठीक नहीं

आबकारी मामले में जज बदलने की अरविंद केजरीवाल की अपील और जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की कोर्ट में पेश न होने के उनके फैसले को लेकर उन पर अवमानना का मामला भले ही न बनता हो लेकिन अरविंद केजरीवाल के इस तरीके को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. जानकारों का कहना है कि इस मामले में अरविंद केजरीवाल ने मामले की सुनवाई कर रहीं न्यायाधीश के सामने ही जज बदलने की मांग की जबकि इसके लिए उन्हें चीफ जस्टिस के पास लिखित तौर पर अपील करनी चाहिए थी.

इस बारे में डीडब्ल्यू ने सुप्रीम कोर्ट के एक और वरिष्ठ वकील से बात की लेकिन उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया. इनकार करने के पीछे उनका तर्क यह था कि दोनों ही पक्षों की ओर से कानून का मजाक उड़ाया गया है. नाम न छापने की शर्त पर जो बात उन्होंने कही, उसका जिक्र करना यहां बहुत जरूरी है. उनका कहना था, "दोनों ही पक्ष कानून का सम्मान नहीं कर रहे हैं. इसलिए यह कानूनी और संवैधानिक मामला ही नहीं है जो मैं बात करूं. अरविंद केजरीवाल को राजनीति करनी थी, चर्चा में आना था, इसलिए उन्होंने ये रास्ता चुना और दूसरी ओर उनकी अपील पर फैसला देते समय जस्टिस स्वर्णकांता ने जो टिप्पणी की, वह भी सही नहीं थी. सवाल ये है कि यदि इस केस से जस्टिस स्वर्णकांता ने खुद को अलग ही कर लिया होता तो क्या बिगड़ जाता. तमाम जज करते हैं. या फिर अपने बेटों को सरकारी पैनल से हटवा देतीं.”

क्या था आबकारी नीति मामला?

आबकारी मामला साल 2021 का है जब अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री रहते दिल्ली सरकार ने नई आबकारी नीति बनाई थी. हालांकि तमाम आरोपों के चलते बाद में इस नीति को वापस ले लिया गया था लेकिन दिल्ली के तत्कालीन उप-राज्यपाल विनय सक्सेना ने इस नई शराब नीति की सीबीआई जांच कराने के आदेश दिए थे. इस मामले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत कई लोगों को सीबीआई ने गिरफ्तार भी किया था और महीनों जेल में रखा था.

लेकिन इसी साल फरवरी में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने इस मामले में सभी अभियुक्तों को आरोप मुक्त कर दिया. यहां तक कि फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने सीबीआई की कार्यशैली पर कड़ी टिप्पणी भी की. लेकिन बाद में सीबीआई ने इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी और यह मामला जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की कोर्ट में गया.

क्या पहले भी ऐसा हो चुका है?

कोर्ट में वकीलों और जजों के बीच आरोप-प्रत्यारोप सामान्य बात है. कई बार जजों पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे हैं, वकील खास मामलों में कुछ विशेष जजों से सुनवाई न करने की अपील भी करते हैं जिनके किसी न किसी तरह उस मामले से हित जुड़े होते हैं और जज भी अक्सर ऐसे मामलों से खुद को अलग कर लेते हैं, लेकिन इस तरह पत्र लिखकर जज से कहना कि मैं आपकी कोर्ट में नहीं आऊंगा, शायद पहली बार है.

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इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील कमल कृष्ण रॉय कहते हैं कि सार्वजनिक तौर पर तो ऐसी स्थितियां सामने नहीं आतीं, लेकिन कोर्ट में ऐसा अक्सर होता रहा है, चाहे हाईकोर्ट हों या फिर सुप्रीम कोर्ट.

कमल कृष्ण रॉय कहते हैं, "बहस के दौरान काफी तल्खी देखी जाती है, लेकिन कोई दुर्भावना नहीं होती. कभी-कभी जजों का बार भी बहिष्कार करती हैं, विभिन्न कारणों से. खासकर क्रिमिनल मामलों में. ये तो लोकतांत्रिक तरीका है और कोर्ट की प्रक्रिया का हिस्सा है. इलाहाबाद हाईकोर्ट में हमने देखा है कि वरिष्ठ वकील रविकिरण जैन का तो कई बार जजों से झगड़ा हो जाता था. कई बार जज लिखकर देते थे कि वो उनके मुकदमे नहीं सुनेंगे और कई बार वकील ही लिखकर देते हैं कि अमुक वकील हमारे मुकदमे न सुनें.”

कमल कृष्ण रॉय इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक दिलचस्प वाकया सुनाते हैं. हाईकोर्ट के दो वकीलों में जबर्दस्त लड़ाई हुई, मारपीट तक हुई. बाद में उन्हीं में से एक वकील जज बन गए. जो वकील ही रह गए, उन्होंने कहा कि हम उनकी कोर्ट में नहीं जाएंगे. लेकिन जज ने उन्हें खुद बुलाकर बात की और कहा कि ‘विवाद अपनी जगह था लेकिन न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठकर मैं पिछले इतिहास को दिमाग में रखकर फैसले नहीं दूंगा, आप निश्चिंत रहिए.'