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“दोस्ती का मतलब सहमति नहीं”: दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा- यौन उत्पीड़न के लिए पीड़िता को दोष नहीं ठहराया जा सकता

दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में सेशंस कोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें यौन उत्पीड़न की शिकार महिला के चरित्र पर टिप्पणी की गई थी.

“दोस्ती का मतलब सहमति नहीं”: दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा- यौन उत्पीड़न के लिए पीड़िता को दोष नहीं ठहराया जा सकता
Representational Image | Pixabay

दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में सेशंस कोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें यौन उत्पीड़न की शिकार महिला के चरित्र पर टिप्पणी की गई थी. सेशंस कोर्ट ने आरोपी को जमानत देते समय कहा था कि महिला शिक्षित है और उसे अपने कार्यों के परिणाम पता होने चाहिए. इस पर पीड़िता ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की. जस्टिस अमित महाजन की सिंगल बेंच ने कहा कि किसी महिला के आरोपी के साथ दोस्ताना या सौहार्दपूर्ण संबंध होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसने यौन उत्पीड़न के लिए सहमति दी थी.

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कोर्ट ने स्पष्ट किया, “केवल इसलिए कि पीड़िता आरोपी को जानती थी या उसके साथ उसके अच्छे संबंध थे, इसका यह अर्थ नहीं है कि वह यौन उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार है. किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह पीड़िता की इच्छा के विरुद्ध उसके साथ ऐसा व्यवहार करे.”

कोर्ट ने यह भी कहा कि सेशंस कोर्ट द्वारा पीड़िता के चरित्र पर संदेह जताना न केवल अनुचित था, बल्कि यह उसके मानसिक आघात को भी तुच्छ साबित करने जैसा है.

क्या था पूरा मामला?

याचिका में बताया गया कि पीड़िता और आरोपी की बातचीत फोन पर शुरू हुई थी. एक दिन दोनों डिनर के लिए मिले, जिसके बाद आरोपी ने उसे जेएनयू कैंपस के अपने हॉस्टल रूम में ठहरने के लिए कहा. अगले दिन जब महिला जाने लगी, तो आरोपी ने उसे एक रात और रुकने के लिए कहा. उसने सहमति दी, लेकिन अगली सुबह जब वह उठी, तो उसने आरोपी को अपने बगल में पाया, जो उसे अनुचित तरीके से छू रहा था.

कुछ दिनों बाद आरोपी ने फिर बुलाया और दोबारा यौन उत्पीड़न किया. इसके बाद पीड़िता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. आरोपी को गिरफ्तार किया गया, लेकिन बाद में सेशंस कोर्ट ने उसे जमानत दे दी.

सेशंस कोर्ट की टिप्पणी पर हाईकोर्ट की नाराजगी

सेशंस कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि महिला “शिक्षित है” और उसे अपने निर्णयों के परिणाम समझने चाहिए. हाई कोर्ट ने इस टिप्पणी को “अवांछित और असंवेदनशील” बताया और कहा कि जमानत सुनवाई के दौरान ऐसे अवलोकन करना अनुचित है.

कोर्ट ने कहा, “इस तरह की टिप्पणियां पीड़िता के चरित्र पर संदेह उत्पन्न करती हैं. केवल इसलिए कि उसने पहली घटना के बाद आरोपी से फिर मुलाकात की, इसका अर्थ यह नहीं कि आरोप झूठे हैं या कम गंभीर हैं.”

कोर्ट ने क्या निर्देश दिए?

दिल्ली हाई कोर्ट ने सेशंस कोर्ट की सभी आपत्तिजनक टिप्पणियों को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में न्यायालयों को संवेदनशीलता और निष्पक्षता से काम लेना चाहिए. साथ ही कहा गया कि जमानत पर सुनवाई करते समय पीड़िता के चरित्र या उसके निजी निर्णयों पर टिप्पणी करना न्यायिक मर्यादा के खिलाफ है.

(The above story first appeared on LatestLY on Oct 07, 2025 10:48 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).