COVID-19 Weekly: डेल्टा वेरिएंट ने अनियमित वैक्सीनेशन की खामियों को उजागर किया
कई देशों के लिए, वैक्सीन कार्यक्रम महामारी के खिलाफ संघर्ष में महत्वपूर्ण बढ़त बनाने में कामयाब रहा है, लेकिन दक्षिण अफ्रीका में, एक बहुत ही अलग कहानी है. आज तक, दक्षिण अफ्रीका के 5% से कम लोगों को टीका लगाया गया है, और देश में एक बार फिर कोविड-19 का प्रकोप बढ़ने लगा है क्योंकि डेल्टा संस्करण जोर पकड़ रहा है.
मेलबर्न, 2 जुलाई : कई देशों के लिए, वैक्सीन कार्यक्रम महामारी के खिलाफ संघर्ष में महत्वपूर्ण बढ़त बनाने में कामयाब रहा है, लेकिन दक्षिण अफ्रीका में, एक बहुत ही अलग कहानी है. आज तक, दक्षिण अफ्रीका के 5% से कम लोगों को टीका लगाया गया है, और देश में एक बार फिर कोविड-19 (COVID-19) का प्रकोप बढ़ने लगा है क्योंकि डेल्टा संस्करण जोर पकड़ रहा है. विटवाटरसैंड विश्वविद्यालय में वैक्सीनोलॉजी के प्रोफेसर शब्बीर ए माधी कहते हैं कि यह देश की टीकाकरण विफलताओं की ओर ध्यान केंद्रित करता है, जो बहुत सी हैं. दक्षिण अफ्रीका ने वैक्सीन की खुराक खरीदने की कोशिश बहुत देर से शुरू की और वैक्सीन हासिल करने वाले देशों की कतार में पीछे रहा, जिससे आपूर्ति में कमी आई. इसके अलावा उसने अपने पास मौजूद टीके लगाने का प्रबंधन भी ठीक से नहीं किया. जून के मध्य में, उसके पास जितने टीके थे वह उनमें से आधे भी नहीं लगा पाया था और उसकी इलेक्ट्रॉनिक टीकाकरण प्रणाली आबादी के सभी समूहों तक पहुंचने में विफल रही थी. लेकिन शायद दक्षिण अफ्रीका की सबसे बड़ी त्रुटि एस्ट्राजेनेका वैक्सीन के साथ थी, जिसे उसने इस आधार पर लगाना बंद कर दिया था कि यह देश में पहले से प्रभावी बीटा संस्करण के कारण होने वाली हल्की से मध्यम बीमारी से अच्छी तरह से रक्षा नहीं करती थी.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के यह कहने के बावजूद कि दक्षिण अफ्रीका को टीका लगाना जारी रखना चाहिए, क्योंकि यह शायद अभी भी गंभीर बीमारी से बचाव करेगा, सरकार ने इसके बजाय 15 लाख खुराक अन्य अफ्रीकी देशों को बेचीं. वह निर्णय, जो बीटा संस्करण के खिलाफ एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की प्रभावशीलता पर प्रोफेसर माधी के नेतृत्व में एक अध्ययन के बाद हुआ, अब एक बड़ी त्रुटि की तरह दिखता है. उन खुराकों का उपयोग नहीं करने से दक्षिण अफ्रीका के टीकाकरण कार्यक्रम को भारी धक्का लगा और उसी का नतीजा है कि अब यह वायरस का डेल्टा संस्करण - जिसके खिलाफ एस्ट्राजेनेका वैक्सीन अच्छा प्रदर्शन करती है - यहां अपना प्रकोप दिखा रहा है. पिछले कुछ महीनों में, हमारे साप्ताहिक राउंडअप में वैक्सीन के प्रति हिचकिचाहट, उत्पादन की बाधाओं और खरीद की समस्याओं पर बहुत ध्यान दिया गया है. लेकिन अब, दक्षिण अफ्रीका ने दिखाया है कि एक और कारक है जो टीकाकरण की सफलता को गंभीर रूप से कमजोर कर सकता है और वह यह है कि सरकार को अपने पास उपलब्ध वैक्सीन पर विश्वास नहीं है. उम्मीद है कि अन्य लोग यह गलती नहीं करेंगे. यह पहले से कहीं अधिक स्पष्ट हो गया है कि लोगों को अपनी वैक्सीन की दूसरी खुराक लेने की आवश्यकता है ताकि उनके कोविड-19 से संक्रमित होने की संभावना को कम किया जा सके.
कार्डिफ मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी में इम्यूनोलॉजी के वरिष्ठ व्याख्याता रेबेका आइशेलर बताते हैं कि फाइजर या एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की दो खुराक लेने के बाद, बीमार होने या अस्पताल में भर्ती होने की संभावना आज भी लगभग उतनी ही है, जितनी अल्फा वेरिएंट के सक्रिय होने के समय थी. लेकिन केवल एक खुराक के साथ, आपको पहले की तुलना में कोविड-19 विकसित होने की बहुत अधिक संभावना है. ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय में मेडिसिन के प्रोफेसर पॉल हंटर का तर्क है कि वैक्सीन की दूसरी खुराक में देरी करना, जैसा कि ब्रिटेन ने किया, अपने आप में सही कदम था, इससे एक खुराक से मिलने वाली अच्छी सुरक्षा ऐसे समय में अधिक लोगों को मिल पाई जब मामले अधिक थे और कमजोर लोगों के पास सुरक्षा कम थी. हां, यह हो सकता है कि इससे एकल-खुराक वाले लोगों में डेल्टा के संपर्क में आने का जोखिम बढ़ जाए, लेकिन एक खुराक लेने के बाद पूर्ण सुरक्षा के बिना भी, गंभीर कोविड -19 विकसित होने की संभावना कम होती है. यह भी पढ़ें : Uttar Pradesh: यूपी में 5 जुलाई से मल्टीप्लेक्स सिनेमाहॉल, जिम और स्पोर्ट स्टेडियम खोलने की मिली अनुमति, कोरोना नियमों का करना होगा पालन
डेल्टा संस्करण के संबंध में ब्रिटिश सरकार की वास्तविक विफलता यह रही कि वह इसे देश में आने से रोकने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं कर पाई. अंत में, अब तक ब्रिटेन की यह नीति रही है कि आपकी टीके की दूसरी खुराक वही होनी चाहिए जो पहली थी - लेकिन समय के साथ, यह बदल सकती है. चल रहे एक अध्ययन के शुरुआती नतीजे बताते हैं कि दोनो बार किसी एक ही कंपनी की वैक्सीन लगवाने की बजाय अगर दूसरी बार अलग वैक्सीन लगवाई जाए तो वायरस के खिलाफ बेहतर प्रतिरक्षा विकसित होती है. मैनचेस्टर विश्वविद्यालय में इन्फ्लेमेट्री डिजीज के प्रोफेसर ट्रेसी हुसेल का ऐसा मानना है. फाइजर के साथ एस्ट्राजेनेका का टीका लगाना विशेष रूप से बेहतर है, जिससे एंटीबॉडी का उच्च स्तर होता है, साथ ही एक बहुत मजबूत टी-सेल प्रतिक्रिया भी होती है. अब जबकि ब्रिटेन और अन्य देशों ने बूस्टर कार्यक्रमों पर विचार करना शुरू कर दिया है, हो सकता है कि वे लोगों को मिलने वाली तीसरी खुराक में अलग कंपनी की वैक्सीन देने का फैसला करें.
(The above story first appeared on LatestLY on Jul 02, 2021 03:44 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

