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बिहार: अब परिवारवाद पर क्यों पलटे नीतीश कुमार

परिवारवाद के घोर विरोधी रहे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार ने अंतत: जेडीयू की सदस्यता ग्रहण कर ली.

बिहार: अब परिवारवाद पर क्यों पलटे नीतीश कुमार
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

परिवारवाद के घोर विरोधी रहे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार ने अंतत: जेडीयू की सदस्यता ग्रहण कर ली. वे बिहार के ऐसे नौवें मुख्यमंत्री होंगे, जिनके बेटे ने पॉलिटिकल डेब्यू किया है.बेदाग छवि और लोकप्रियता के चरम पर विराजमान ये वही नीतीश कुमार हैं, जो सार्वजनिक मंचों से अक्सर लालू प्रसाद यादव पर परिवार को प्रश्रय देने और केवल उनकी ही चिंता करने को लेकर तंज कसते थे. वे राहुल गांधी और तेजस्वी यादव जैसे नेताओं को परिवारवाद का अवतार कहते थे. हालांकि, नीतीश कुमार ने भले ही अपने परिवार को राजनीति में नहीं बढ़ाया, परंतु दूसरे राजनेताओं के बेटे-बेटियों और पत्नियों को तो बढ़ाया ही. इससे पहले 'फ्री-बीज' के मामले पर नीतीश पलट ही चुके हैं. तभी तो उन्होंने राज्य में सवा सौ यूनिट मुफ्त बिजली देने की घोषणा की. जबकि, इसे लेकर आम आदमी पार्टी की वे खूब आलोचना करते थे.

जेडीयू ने निशांत के पदार्पण को युवा सोच, मजबूत संकल्प की संज्ञा दी है और कहा है कि अब युवा सोच से बदलाव की नई बयार बहेगी, यह ऐतिहासिक और नया सूर्योदय है. जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने रविवार को सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि निशांत कुमार का पार्टी में औपचारिक रूप से शामिल होना केवल एक सदस्यता नहीं, बल्कि एक समृद्ध राजनीतिक और सामाजिक विरासत के नए वाहक का आगमन है.

वहीं, पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने के बाद निशांत कुमार ने कहा कि वह अपने पिता नीतीश कुमार के मार्गदर्शन में पार्टी को संगठन को मजबूत करने और उनके विकास कार्यो व उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाने की कोशिश करेंगे. रविवार को लंबे-चौड़े काफिले में हाथी, घोड़ा, ऊंट और बैंड-बाजे के साथ फूलों की बारिश व रंग-गुलाल के बीच निशांत की पार्टी दफ्तर में एंट्री हुई. जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने उन्हें सदस्यता ग्रहण कराई. हालांकि, नीतीश कुमार ने पूरे आयोजन से दूरी बनाए रखी. सदस्यता लेने के बाद निशांत पिता से मिले और उनसे आशीर्वाद लिया.

बेटे का व्यामोह या जेडीयू को टूट से बचाने की कोशिश

राजनीतिक जीवन के आखिरी पड़ाव पर आखिरकार नीतीश भी वंशवाद के बेल की लपेट में आ ही गए. राजनीतिक समीक्षक एके चौधरी कहते हैं, ‘‘निशांत को सक्रिय राजनीति में लाने की मांग पार्टी का एक तबका काफी पहले से कर रहा था. नीतीश कुमार इससे हिचकते रहे थे. उनके राज्यसभा जाने का निर्णय करने के साथ पार्टी में एक वैक्यूम की स्थिति तो उत्पन्न हो ही गई थी. इसी कारण पार्टी के नेता-कार्यकर्ता विरोध भी कर रहे थे. शायद यही उचित अवसर लगा होगा या यह महसूस हुआ होगा कि निशांत में उनका वोट बैंक नीतीश कुमार की अक्स देखकर उनके साथ इंटैक्ट रहेगा.''

बीजेपी इतना तो समझती ही है कि अगर जेडीयू में बिखराव हुआ तो बिहार में सत्ता हाथ से फिसल जाएगी. क्योंकि नीतीश का वोट बैंक उनके साथ ही आएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है. वहीं, नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर एनडीए के एक नेता कहते हैं, ‘‘सीधी बात है कि नीतीश कुमार का स्वास्थ्य अब साथ नहीं दे रहा. उन्हें पार्टी की जितनी चिंता सता रही, उतने ही उन नेताओं को भी सता रही होगी जो उनके वोट बैंक की सीढ़ी चढ़कर सत्ता का सुख भोग रहे. उनके लिए जेडीयू को बचाए रखना नितांत जरूरी है. तभी उनकी सार्थकता भी बनी रहेगी. निशांत के अलावा किसी और को उनका पारंपरिक वोट बैंक स्वीकार नहीं करता.''

स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद जनाधार उनके पक्ष में है. बीजेपी भली-भांति जानती है कि नीतीश कुमार के वोट बैंक या उनके विधायकों को अपने पक्ष में करने की कोशिश करना काफी रिस्की है और उसके पास राजनीतिक समीकरण के अनुसार उस कद का नेता भी नहीं है. इसलिए, निशांत का राजनीति में आना नीतीश कुमार का पुत्र मोह नहीं, बल्कि पार्टी को बिखरने से बचाने का प्रयास ही दिखता है. पत्रकार विनय तिवारी कहते हैं, ‘‘हाल के दिनों में बदले राजनीतिक घटनाक्रम के बीच जेडीयू में असंतोष भी तेजी से उभरा. कुछ नेताओं को निशाने पर लेकर विरोध प्रदर्शन किया गया. इस असंतोष को जल्द से जल्द दबाने के लिए निशांत को पार्टी में ला कर उन्हें नीतीश कुमार की जगह खड़ा करने की कोशिश की गई. अगर पुत्र मोह होता तो नीतीश कुमार इतना लंबा इंतजार क्यों करते.''

अपवाद से सामान्य बन गए नीतीश कुमार

निशांत के जेडीयू में शामिल होने के साथ ही नीतीश कुमार भी परिवारवाद के मोर्चे पर अपवाद की जगह सामान्य की श्रेणी में आ गए. वह उन्हीं राजनेताओं की कतार में आ गए, जिनके बेटे-बेटी उनकी विरासत संभालने के नाम पर राजनीति में आए. राजनीति विज्ञान से पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहीं विनीता अमरेश कहती हैं, ‘‘पॉलिटिकल पार्टियां तो यही नैरेटिव ही गढ़ रही हैं कि परिवारवाद से ही पार्टी का भला हो सकता है. उनके बेटे-बेटी ही पार्टी को संभाल सकते हैं. इसलिए तो निशांत कुमार को डिप्टी सीएम बनाने की बात चल रही है. क्या जेडीयू में निशांत से काबिल कोई और नेता ही नहीं हैं.''

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दरअसल, खासकर रीजनल पार्टियों में यही परंपरा चली ही नहीं आ रही, बल्कि और मजबूत हो रही कि उनके क्षत्रप की संतान ही उनकी विरासत को संभालेगी. उनके प्रतिद्वंदियों को भी यह भाता ही है. युवा छात्रा विनीता कहती हैं, ‘‘एक तरह से उनकी यह मजबूरी भी है. क्योंकि उनका वोट बैंक तो उनसे ही इंटरैक्ट करता है. जब तक उनका काम होता रहता है, तब तक सब कुछ ठीक रहता है. किसी कारणवश जैसे ही कमान दूसरी पंक्ति के नेता को दी जाती है तो उपेक्षा का भाव जागृत होने में देर नहीं लगती है और फिर असंतोष उपजता है.''

परिवारवाद में बदल गया सामाजिक न्याय

1970 के दशक में छात्र आंदोलन से निकले लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान ऐसे नेता रहे, जिन्होंने सामाजिक न्याय के नारे के साथ राजनीति कर बिहार के राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य को बदल कर रख दिया. 1990 में लालू प्रसाद के मुख्यमंत्री बनने के साथ बिहार में सामाजिक बदलाव का दौर शुरू हुआ. इसमें कोई दो राय नहीं कि उन्होंने वर्षों से हाशिये पर पड़े शोषितों-वंचितों को आवाज दी. उनके शासनकाल को सामाजिक न्याय का चरम माना जा सकता है. लेकिन, 1997 में अपनी सत्ता पर संकट आने पर उन्होंने उस परिवारवाद का ही सहारा लिया, जिसका विरोध कर समाजवाद की राजनीति की नींव रखी थी.

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पशुपालन घोटाला में जेल जाने की नौबत आने पर उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया था. उस वक्त भी नीतीश कुमार ने लालू के इस निर्णय पर तंज कसा था. लालू ने बाद में परिवारवाद को भली-भांति सींचा और अपने बेटे तेजप्रताप और तेजस्वी तथा बेटियों, मीसा भारती और रोहिणी आचार्य को राजनीति में उतार दिया. आरजेडी की कमान अंतत: उन्होंने अपने छोटे पुत्र तेजस्वी यादव को सौंप दी. विरासत के खेल में ही उनके बड़े पुत्र तेजप्रताप परिवार से अलग हो गए और पिता को किडनी देने वाली बेटी रोहिणी भी नाराज चल रहीं.

राजनीति के मौसम वैज्ञानिक कहे जाने वाले और खासकर दलितों की राजनीति करने वाले रामविलास पासवान ने भले ही सार्वजनिक मंचों से परिवारवाद पर जमकर प्रहार किया, किंतु राजनीति में अपने भाइयों को ही बढ़ाया. उनके भाई ही विधायक, सांसद व मंत्री बने. हालांकि, परिवार में एकता नहीं रहने से उनकी पार्टी दो फाड़ हो गई. उनके बेटे चिराग पासवान आज उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे. वे आज केंद्रीय मंत्री हैं. इस कड़ी में अब तक नीतीश कुमार ही ऐसे थे, जो हर मंच पर परिवारवाद पर घोर प्रहार करते थे. बेटे का व्यामोह हो या फिर पार्टी को एकजुट रखने की कवायद, आखिरकार उन्होंने भी साल भर की ना-नुकुर के बाद बेटे को राजनीति को उतार ही दिया.

जाहिर है, अब नेतृत्व शून्यता को भरने के साथ ही निशांत कुमार पर पार्टी ही नहीं, जनाधार बचाने की भी जिम्मेदारी होगी. जिनके बदौलत नीतीश कुमार बीते 21 साल से बिहार की राजनीति की धुरी बने रहे. उन्हें खुद को पिता की तरह ही ‘परिवार पहले नहीं, बिहार पहले' वाला नेता साबित करना होगा.

(The above story first appeared on LatestLY on Mar 09, 2026 07:50 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).