Assembly Elections 2026: फर्जी मतदान रोकने के लिए क्या होगा बायोमेट्रिक सत्यापन? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट (Photo Credits: X/@ANI)

नई दिल्ली, 13 अप्रैल: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए भारतीय चुनाव आयोग (Election Commission of India) ईसीआई (ECI), केंद्र सरकार (Central government) और राज्य सरकारों (State Governments) को नोटिस जारी किया है. इस याचिका में मांग की गई है कि चुनावों के दौरान फर्जी मतदान, दोहराव और किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर वोट डालने (Impersonation) जैसी धांधलियों को रोकने के लिए मतदान केंद्रों पर 'फिंगरप्रिंट' और 'आइरिस' (आंखों की पुतली) आधारित बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली लागू की जाए.

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि हालांकि यह नियम आगामी निकटवर्ती चुनावों में लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन भविष्य के संसदीय और विधानसभा चुनावों के लिए इसकी व्यवहार्यता की जांच करना आवश्यक है. यह भी पढ़ें: Assembly Elections 2026: वोटिंग से 48 घंटे पहले ओपिनियन पोल पर रोक, चुनाव आयोग ने जारी किए सख्त निर्देश

याचिका के मुख्य बिंदु और 'एक नागरिक, एक वोट' का सिद्धांत

यह याचिका अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर की गई है.  इसमें संविधान के अनुच्छेद 32 का हवाला देते हुए मौजूदा मतदान प्रणाली की खामियों पर चिंता जताई गई है. याचिका के अनुसार:

  • वर्तमान में वोटर आईडी कार्ड और मैन्युअल सत्यापन के तरीके पुराने हो चुके हैं.
  • धुंधली तस्वीरों और लिपिकीय त्रुटियों के कारण फर्जीवाड़े की गुंजाइश बनी रहती है.
  • बायोमेट्रिक सत्यापन 'एक नागरिक, एक वोट' के सिद्धांत को सख्ती से लागू करने में मदद करेगा, क्योंकि यह तकनीक अद्वितीय और गैर-नकल योग्य है.

तकनीक के साथ जुड़ी चुनौतियां: नियमों में बदलाव और वित्तीय बोझ

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस प्रस्ताव के व्यवहारिक पहलुओं पर भी टिप्पणी की.  अदालत ने नोट किया कि पूरे देश में बायोमेट्रिक सिस्टम लागू करने के लिए:

  1. मौजूदा चुनाव नियमों में बड़े स्तर पर संशोधन की आवश्यकता होगी.
  2. सरकारी खजाने पर एक महत्वपूर्ण वित्तीय बोझ पड़ेगा.

इन्हीं कारणों से अदालत ने कहा कि इसे तुरंत लागू करना संभव नहीं है, लेकिन दीर्घकालिक सुधार के रूप में इस पर विचार किया जाना चाहिए.

'घोस्ट वोटर्स' और प्रवासी मतदाताओं की समस्या का समाधान

याचिका में तर्क दिया गया है कि बायोमेट्रिक सत्यापन न केवल फर्जी या 'घोस्ट वोटर्स' को हटाएगा, बल्कि प्रवासी मतदाताओं और मतदाता सूची में दोहरी प्रविष्टियों से जुड़ी समस्याओं को भी हल करेगा. यह रीयल-टाइम ऑडिट ट्रेल (Audit Trail) बनाने में मदद करेगा, जिससे चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी. यह भी पढ़ें: West Bengal Election 2026: अमति शाह ने जारी किया BJP का 'संकल्प पत्र', UCC लागू करने, युवाओं को 1 करोड़ नौकरियां समेत किए कई बड़े वादे; यहां पढ़ें मेनिफेस्टो की मुख्य बातें

आगे की राह

सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद अब चुनाव आयोग और सरकार को इस तकनीक के कार्यान्वयन, इसकी लागत और सुरक्षा संबंधी पहलुओं पर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करना होगा. इस याचिका का भविष्य अब सरकार के रुख और तकनीक की सुरक्षा पर निर्भर करेगा. यदि यह प्रणाली भविष्य में स्वीकार की जाती है, तो यह भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में सबसे बड़े तकनीकी सुधारों में से एक होगा.