Sushant Singh Rajput Case: बंबई उच्च न्यायालय ने पूछा- टीवी न्यूज चैनलों पर सरकार का नियमन क्यों नहीं होना चाहिए?
बंबई उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि उसे यह जानकर हैरानी हुई है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है और यह भी पूछा कि सरकार द्वारा टीवी न्यूज चैनलों का नियमन क्यों नहीं होना चाहिए.
मुंबई: बंबई उच्च न्यायालय (Bombay High Court) ने बृहस्पतिवार को कहा कि उसे यह जानकर हैरानी हुई है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है और यह भी पूछा कि सरकार द्वारा टीवी न्यूज चैनलों का नियमन क्यों नहीं होना चाहिए.
मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जी एस कुलकर्णी की पीठ ने कुछ याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की. इन याचिकाओं में अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले से जुड़ी विभिन्न राहत के साथ ही मामले के कवरेज में प्रेस को संयम बरतने के लिए निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है. पीठ ने मामले में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को भी एक पक्ष बनाया है. Bihar Assembly Elections 2020: बिहार चुनाव में सुशांत मुद्दे से जनभावनाओं को भुनाने में जुटे राजनीतिक दल
पीठ ने मंत्रालय को जवाब दाखिल कर यह बताने को कहा है कि खबर प्रसारित करने के मामले में किस हद तक सरकार का नियंत्रण होता है, खास कर ऐसी खबरों के बारे में जिसका व्यापक असर होता है. पीठ ने मामले में जांच कर रही केंद्रीय एजेंसियों-नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को भी पक्ष बनाया है.
यह कदम तब उठाया गया जब एक याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि एजेंसियां जांच संबंधी सूचनाएं प्रेस और जनता को ‘लीक’ कर रही हैं. हालांकि, पीठ ने मामले में अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती को प्रतिवादी बनाने से इनकार कर दिया.
पीठ ने कहा, ‘‘हम प्रस्तावित प्रतिवादी नंबर 12 (चक्रवर्ती) को पक्षकार के तौर पर शामिल करने का कोई कारण नहीं देखते हैं, जो कि अभी न्यायिक हिरासत में है.’’
कार्यकर्ताओं और आठ सेवानिवृत्त वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने दायर याचिकाओं में आरोप लगाया है कि कई टीवी चैनल मामले में समानांतर जांच चला रहे हैं और वे मामले में खबरों के जरिए मुंबई पुलिस के खिलाफ द्वेषपूर्ण अभियान चला रहे हैं.
एक अन्य पीठ ने तीन सितंबर को इन्हीं याचिकाओं पर सुनवाई की थी और सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में घटनाक्रम के कवरेज के दौरान प्रेस से संयम बरतने के अनुरोध वाला एक आदेश जारी किया था.
पूर्व पुलिस अधिकारियों की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मिलिंद साठे ने बृहस्पतिवार को पीठ से कहा कि आदेश के बावजूद टीवी चैनलों का मुंबई पुलिस के खिलाफ द्वेषपूर्ण अभियान जारी है. साठे ने न्यूज चैनलों के प्रसारण की कुछ विषयवस्तु भी पेश की जिसमें परोक्ष रूप से इशारा किया गया है कि मुंबई पुलिस आरोपियों और ‘‘नशीले पदार्थों के माफिया’’ को बचा रही है.
मुख्य न्यायाधीश दत्ता ने अधिवक्ता साठे से कहा कि कोई एंकर क्या कह रहा है इससे उन्हें परेशान नहीं होना चाहिए. हालांकि, उन्होंने कहा कि अदालत यह अपेक्षा करती है और उसे विश्वास है कि ‘‘टीवी न्यूज चैनलों को तीन सितंबर की तारीख वाले आदेश की भावना को ध्यान में रखना चाहिए.’’
बहरहाल, केंद्र सरकार ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को अपनी शिकायतों के संबंध में प्रिंट मीडिया का नियमन करने वाले वैधानिक निकाय भारतीय प्रेस परिषद और टीवी न्यूज चैनलों के खिलाफ अपनी शिकायत पर न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी (एनबीएसए) का रूख करना चाहिए. इस पर पीठ ने कहा कि एनबीएसए वैधानिक निकाय नहीं है.
पीठ ने कहा, ‘‘हमें हैरानी है कि सरकार का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर नियंत्रण नहीं है. इसका (टीवी न्यूज चैनलों) ऐसे मामलों में नियमन क्यों नहीं होना चाहिए, जहां इसका व्यापक असर होता है.’’ पीठ ने सभी पक्षों को अपने जवाब दो हफ्ते में दाखिल करने को कहा है. साथ ही कहा कि याचिकाएं लंबित रहने तक एनबीएसए ऐसी खबरों के खिलाफ कोई भी शिकायत मिलने पर कदम उठाने के लिए स्वतंत्र है.
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(The above story first appeared on LatestLY on Sep 10, 2020 04:44 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

