देश की खबरें | बहुमत से दूर भाजपा के लिए चिंतन का समय

नयी दिल्ली, चार जून प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए संदेश और संदेशवाहक दोनों ही थे और उन्होंने प्रचार अभियान में कड़ी मेहनत की बदौलत अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को बौना भी कर दिया, लेकिन मंगलवार को आए नतीजों में ऐसा लगा कि विपक्ष ने इस संदेश पर पानी फेर दिया और दक्षिणपंथी पार्टी 543 सदस्यीय लोकसभा में बहुमत के 272 के आंकड़े से काफी नीचे सिमट गई।

हालांकि, भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के जादुई आंकड़े को आसानी से पार कर लेने की उम्मीद है।

प्रधानमंत्री मोदी ने राजग के बहुमत हासिल करने को भारत के इतिहास में ‘एक अभूतपूर्व पल’ करार दिया और देशवासियों को विश्वास दिलाया कि वह उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए नई ऊर्जा, नई उमंग, नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ेंगे।

लोकसभा चुनाव के अब तक आए नतीजों के मुताबिक भाजपा अब तक 143 सीटों पर जीत दर्ज कर चुकी है, जबकि 97 सीटों पर उसके उम्मीदवार आगे हैं। भाजपा कुल मिलाकर 240 सीट जीतने की राह पर है। राजग का आंकड़ा 300 के करीब पहुंचता दिख रहा है।

मोदी ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘देश की जनता-जनार्दन ने राजग पर लगातार तीसरी बार अपना विश्वास जताया है। भारत के इतिहास में ये एक अभूतपूर्व पल है। मैं इस स्नेह और आशीर्वाद के लिए अपने परिवारजनों को नमन करता हूं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैं देशवासियों को विश्वास दिलाता हूं कि उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हम नई ऊर्जा, नई उमंग, नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ेंगे।’’

प्रधानमंत्री के इस बयान के बावजूद, पार्टी से इस बात पर विचार करने की उम्मीद की जाती है कि उसकी संख्या में तेज गिरावट का कारण क्या है। उसे 2019 में 303 सीट मिली थीं।

विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा ने चुनाव पूरी तरह से ‘ब्रांड मोदी’ पर लड़ा और यहां तक कि अपने घोषणापत्र को ‘मोदी की गारंटी’ का नाम दिया। हालांकि, विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन देश भर में भले न सही कई राज्यों में उसके खिलाफ विमर्श खड़ा करने और नेतृत्व के मुद्दे पर उसे नुकसान पहुंचाने में सफल रहा।

विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा नेताओं ने इस चुनाव में कई गलत कदम उठाए जो इसे स्वीकार भी करते हैं। मसलन, टिकट वितरण में गड़बड़ी, निर्वाचन क्षेत्रों में कम लोकप्रिय उम्मीदवारों का चयन और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य में किसी भी सूरत में गठबंधन के लिए दलों को साधना।

मोदी ने चुनाव में विपक्ष के कथित मुस्लिम तुष्टीकरण के इर्द-गिर्द विमर्श गढ़ने की कोशिश की, लेकिन उनके विवादास्पद शब्दों के चयन ने उन्हें आलोचना झेलने को भी मजबूर किया। भाजपा ने अपने घोषणापत्र के बारे में चर्चा करने से अधिक विपक्ष के घोषणापत्र में रूचि दिखाई और उसके घोषणापत्र को लेकर, विशेषकर कांग्रेस पर हमला जारी रखा।

प्रधानमंत्री ने विपक्ष को धूल चटाने के लिए '400 पार' का नारा दिया और यह संकेत दिया कि भाजपा का रथ एक और बड़े बहुमत की ओर बढ़ रहा है, लेकिन कई राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इसने उनके समर्थकों को आत्मसंतोष की भावना में डाल दिया और विपक्ष को ‘संविधान व आरक्षण को खतरा’ तथा जांच एजेंसियों के ‘दुरुपयोग’ जैसे मुद्दों पर लामबंद होने का मौका दिया।

भाजपा के एक नेता ने कहा कि चूंकि पार्टी के मध्य प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और गुजरात सहित कई राज्यों में जीत हासिल करने की उम्मीद है, इसलिए पार्टी के एजेंडे या उसके नेतृत्व के खिलाफ फैसले की व्याख्या करना गलत होगा।

उक्त नेता ने यह भी कहा कि भाजपा ओडिशा विधानसभा में पहली बार बहुमत हासिल कर रही है और कुल मिलाकर अधिकांश राज्यों में विपक्ष की तुलना में अधिक सीट जीत रही है।

उन्होंने कहा कि यह चुनाव परस्पर विरोधी विमर्श की लड़ाई बन गई थी और राजस्थान, हरियाणा तथा महाराष्ट्र जैसे कई राज्यों में चुनाव क्षेत्रीय कारकों से ज्यादा प्रभावित हुए हैं।

हालांकि, पार्टी के लिए खतरे की घंटी उत्तर प्रदेश में मिला चौंकाने वाला झटका है। साल 2014 में मोदी लहर पर सवार होकर भाजपा ने इसे अपने गढ़ के रूप में तब्दील कर दिया था। पार्टी ने 80 में से 33 सीट पर जीत हासिल की है या आगे है। साल 2019 में उसे 62 सीट पर जीत मिली थी।

ऐसा लगता है कि भाजपा को अत्यंत पिछड़े वर्गों के अलावा उच्च जातियों सहित पार्टी के प्रति समर्पित कुछ जातियों के वोटों का एक बड़ा हिस्सा गंवा दिया और यह कांग्रेस व सपा गठबंधन के हिस्से में चला गया, क्योंकि अखिलेश यादव ने सामाजिक समीकरण का खासा ध्यान रखा और उसके अनुरूप टिकटों का बंटवारा भी किया। इसके अलावा उन्होंने यादव और मुसलमान उम्मीदवारों की संख्या में कटौती की जिसे कि उनके समर्थन का मूल आधार माना जाता रहा है।

इन नतीजों से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर चल रही राजनीतिक बहस तेज होने की संभावना है, क्योंकि पार्टी के भीतर उनके विरोधियों की कमी नहीं है। पार्टी नेताओं ने स्वीकार किया कि बेरोजगारी के मुद्दे ने कई राज्यों में नुकसान पहुंचाया है, खासकर युवाओं के बीच।

गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में चुनावी राजनीति में प्रवेश करने के बाद से हर चुनाव में प्रतिद्वंद्वियों पर हावी होने वाले मोदी को अब पहली बार गठबंधन सरकार की अनिश्चितताओं और सहयोगियों की मांगों को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ना होगा।

भाजपा-नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के 290 से ऊपर और बहुमत के 272 सीटों के आंकड़े के बीच उम्मीद की जा रही है कि नई सरकार का नेतृत्व मोदी ही करेंगे। इसमें सहयोगी दल पहले से कहीं अधिक मायने रखेंगे।

पिछले 10 वर्षों में राजग की भी महत्ता भी कम हुई, क्योंकि भाजपा के बड़े बहुमत और लोकसभा में सिकुड़ते विपक्ष ने भाजपा के सहयोगियों को कमोबेश निरर्थक बना दिया था।

ब्रजेन्द्र

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