देश की खबरें | बाघ पर्यावास क्षेत्रों को अतिक्रमण से मुक्त रखना होगा : सरकार ने न्यायालय से कहा

नयी दिल्ली, नौ जनवरी केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में कहा है कि राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के महत्वपूर्ण बाघ पर्यावास क्षेत्रों को बाघ संरक्षण के लिए अतिक्रमण से मुक्त रखना होगा और वन्यजीव (संरक्षण) कानून, 1972 के प्रावधान इस बिंदु को स्पष्ट रेखांकित करते हैं।

सरकार ने जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क को उत्तराखंड में बाघ अभयारण्य के महत्वपूर्ण क्षेत्र में एक निजी संचालक की बसें चलाने की अनुमति देने के फैसले पर एक याचिका पर शीर्ष अदालत में दायर हलफनामे में यह बात कही।

न्यायमूर्ति एस के कौल और न्यायमूर्ति ए एस ओका की पीठ के समक्ष सोमवाई को मामला सुनवाई के लिए आया।

उत्तराखंड की ओर से पक्ष रख रहे वकील ने पीठ से कहा कि राज्य सरकार इस मामले में अपना जवाबी हलफनामा दायर करना चाहेगी।

मामले में सुनवाई छह सप्ताह बाद करने का निर्णय करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के निदेशक द्वारा 23 दिसंबर, 2020 को जारी कार्यालयीन पत्र के क्रियान्वयन पर रोक लगाने का 18 फरवरी, 2021 का उसका आदेश जारी रहेगा।

याचिका दाखिल करने वाले अधिवक्ता गौरव कुमार बंसल ने पहले शीर्ष अदालत में कहा था कि जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क का फैसला वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम का उल्लंघन है।

शीर्ष अदालत में दायर जवाबी हलफनामे में केंद्र ने कहा कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत एक वैधानिक निकाय है और बाघ संरक्षण को मजबूती प्रदान करने के लिए इसका गठन किया गया था।

पिछले साल सितंबर में दायर हलफनामे में कहा गया, ‘‘अत्यंत विनम्रता से यह दलील दी जाती है कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 38 वी (4)(आई) इस बात को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है कि राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के महत्वपूर्ण बाघ पर्यावास क्षेत्रों को बाघ संरक्षण के लिए अतिक्रमण से मुक्त रखना होगा।’’

उसने कहा कि 1972 के कानून के प्रावधान के अनुसार कुछ गिने चुने लोगों को कानून की धारा 28 के तहत जरूरी अनुमति के बिना किसी राष्ट्रीय अभयारण्य में प्रवेश करने की अनुमति है।

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