नयी दिल्ली, 10 फरवरी दिव्यांगों के अधिकार के लिये काम करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि सिर्फ रैंप बना देना दिव्यांग लोगों के लिये पर्याप्त नहीं । उन्होंने कहा कि सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संसद की नई इमारत तक विभिन्न प्रकार की दिव्यांगता से पीड़ित लोगों की सहज पहुंच सुलभ हो।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को राज्यसभा की अंतिम पंक्ति में एक सीट नामित किए जाने के बाद मौजूदा संसद भवन के दिव्यांगों के अनुकूल नहीं होने पर बहस छिड़ गई क्योंकि उनकी व्हीलचेयर को आगे की पंक्ति में लाना मुश्किल था।
दिव्यांगों के अधिकार के लिये काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने आशा व्यक्त की कि निर्माणाधीन नया संसद भवन सिर्फ शारीरिक रूप से दिव्यांग लोगों के लिये ही नहीं बल्कि सभी प्रकार की दिव्यांगताओं से पीड़ित लोगों के सामने आने वाली चुनौतियों का समाधान पेश करेगा।
इस बारे में पूछे जाने पर, केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) के एक अधिकारी ने कहा कि नए संसद भवन में दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 द्वारा निर्धारित सभी आवश्यक दिशानिर्देशों का पालन किया जाएगा।
‘नेशनल प्लेटफॉर्म फॉर द राइट्स ऑफ द डिसेबल्ड’ (एनपीआरडी) के महासचिव मुरलीधरन ने कहा कि यह समझने की जरूरत है कि हर दिव्यांगता की अपनी आवश्यकता होती है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक दिव्यांगता की अपनी विशिष्ट जरूरतें होती हैं। दृष्टिबाधित व्यक्ति को सुनने में अक्षम व्यक्ति की तुलना में एक अलग तरह की आवश्यकता होती है। व्हीलचेयर का इस्तेमाल करने वाले की जरूरतें अलग होती हैं।
उन्होंने सवाल किया, “क्या संसद की नई इमारत में इन पर ध्यान दिया गया है?”
दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 के प्रावधानों के अनुसार, 14 जून, 2022 तक सभी मौजूदा सार्वजनिक भवनों को दिव्यांगों के अनुकूल बनाने के लिए पांच साल की समयावधि तय की गई थी लेकिन अब तक राज्य के केवल 585 भवनों और केंद्र सरकार के केवल 1,030 भवनों को दिव्यांगों के लिए बाधा मुक्त बनाया जा सका है।
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