बेंगलुरु, 31 अगस्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शनिवार को कहा कि जब मुख्यमंत्री के खिलाफ आरोप हो, तो राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
मेहता, राज्यपाल थावरचंद गहलोत की ओर से कर्नाटक उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना के समक्ष पेश हुए।
मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने मैसुरु शहरी विकास प्राधिकरण (एमयूडीए) में कथित भूखंड आवंटन घोटाले की जांच और मुकदमा चलाने के लिए राज्यपाल द्वारा दी गई मंजूरी को रद्द करने का अनुरोध करते हुए याचिका दायर की थी।
एमयूडीए घोटाला विभिन्न लोगों को वैकल्पिक भूखंड के अवैध आवंटन से संबंधित है। आरोप है कि सिद्धरमैया की पत्नी भी इसकी लाभार्थी हैं। हालांकि, सिद्धारमैया ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया है। अदालत में दायर याचिकाओं के आधार पर, राज्यपाल ने मुख्यमंत्री के खिलाफ जांच और मुकदमा चलाने की अनुमति दी है।
अदालत ने मामले की सुनवाई सोमवार के लिए निर्धारित कर दी।
मेहता ने कहा कि राज्यपाल केवल यह कह सकते हैं कि प्रथम दृष्टया आपराधिक मामला बनता है, लेकिन आखिरकार जांच अधिकारी यह तय करेंगे कि किस प्रावधान के तहत आरोप पत्र दाखिल किया जाएगा।
मेहता ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17 (ए) के अनुसार, कोई भी पुलिस अधिकारी किसी लोक सेवक द्वारा किये गए कथित अपराध की जांच इस अधिनियम के तहत नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि हालांकि, यह भारतीय न्याय संहिता या भारतीय दंड संहिता की बात नहीं करता।
उन्होंने स्पष्ट किया, ‘‘मेरा कहना है कि यह केवल आरोप है। इस पर अभी निर्णय लिया जाना बाकी है और राज्यपाल को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए पर निर्णय लेना है।’’
मेहता ने कहा, ‘‘राज्यपाल केवल यह कहेंगे कि प्रथम दृष्टया आपराधिक मामला बनता है और यह जांच अधिकारी तय करना है कि किस प्रावधान के तहत आरोप पत्र (यदि कोई हो) दाखिल किया जाएगा, क्योंकि जांच के परिणामस्वरूप आरोप पत्र दाखिल किया जा सकता है या ‘क्लोजर रिपोर्ट’ दाखिल की जा सकती है।’’
हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि आरोप पत्र दाखिल किये जाने की स्थिति में, जांच अधिकारी विशिष्ट आरोपों के लिए लागू प्रावधानों का ब्योरा देने वाले रिकॉर्ड की सामग्री के आधार पर स्वतंत्र रूप से अपना निर्णय लेंगे।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा, ‘‘राज्यपाल के तौर पर मुझे यह देखना होगा कि क्या शिकायत और पेश किये गए दस्तावेज एक संज्ञेय अपराध का मामला बनाते हैं, जिसकी जांच की आवश्यकता हो। इसका परिणाम आरोप पत्र या क्लोजर रिपोर्ट हो सकती है, लेकिन यह निर्णय लेने की अनुमति राज्यपाल को नहीं है। राज्यपाल यह नहीं कह सकते कि मैंने जांच की है और गंभीर प्रकृति का संज्ञेय अपराध का मामला बनता है।’’
उनके अनुसार, राज्यपाल प्रथम दृष्टया मामले के आधार पर ही निर्णय लेंगे कि इसकी जांच किसी जांच एजेंसी से कराने की जरूरत है या नहीं।
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