नयी दिल्ली, 25 मार्च देश में महामारी के दौरान पिछले साल 25 मार्च से लागू लॉकडाउन में डिजिटल माध्यम राजनीतिक युद्ध का मैदान बना रहा तथा और अधिक विभाजनकारी विमर्श चलता रहा।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ऑनलाइन माध्यम से आयोजित की गईं प्रेस वार्ताएं और ट्विटर पर छींटाकशी तथा नोकझोंक से विभाजनकारी शक्तियों को और बल मिला।
गत वर्ष कोविड-19 के प्रसार के दौरान अर्थव्यवस्था गर्त में चली गई, लोग अपने घरों में बंद रहे और लाखों लोगों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ा जिनमें ऊंचा वेतन पाने वालों से लेकर प्रवासी श्रमिक शामिल थे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च 2020 को राष्ट्र को संबोधित करते आधी रात से लॉकडाउन की घोषणा की जिससे देशभर में लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा।
कांग्रेस और वाम दलों की ओर से इस निर्णय की पुरजोर आलोचना की गई।
राजनीतिक टिप्पणीकार संजय कुमार और रशीद किदवई के अनुसार महामारी से लड़ने के लिए सरकार खुद फैसले ले रही थी जिससे विभाजन और गहरा होता गया।
हालांकि, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर संजय के. पांडेय का मानना है कि ध्रुवीकरण के लिए विपक्ष भी उतना ही जिम्मेदार है क्योंकि वह रचनात्मक भूमिका निभा सकता था।
उन्होंने कहा कि हर मुद्दे पर संघर्ष की स्थिति बन गई है जो भारतीय लोकतंत्र के लिए सही नहीं है।
उन्होंने पीटीआई- से कहा, “महामारी ने (वैश्विक स्तर पर) सरकार की क्षमता की सीमा और महत्व को भी दर्शाया है क्योंकि टीकाकरण कार्यक्रम पर भारत सरकार ने अच्छा काम किया।”
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