नयी दिल्ली, आठ जून लंबे समय तक कोरोना वायरस से संक्रमित रहे लोगों में थकान का असर कैंसर से जुड़े ‘एनीमिया’ या किडनी के गंभीर रोग से ग्रसित मरीजों के समान है क्योंकि यह स्थिति मस्तिष्काघात से भी अधिक खराब और पर्किंसन रोग के मरीजों जैसी होती है।
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) और यूनिवर्सिटी ऑफ एग्जेटर, ब्रिटेन के शोधार्थियों के नेतृत्व में किये गये अध्ययन में मरीज के स्वास्थ्य से जुड़ी जीवन की गुणवत्ता भी कैंसर के चतुर्थ चरण के मरीजों से ज्यादा खराब पाई गई।
यूनिवर्सिटी ऑफ एग्जेटर मेडिकल स्कूल में प्रोफेसर एवं अध्ययन के सह लेखक विलियम हेनली ने कहा, ‘‘हमारे शोध में यह पता चला है कि लंबे समय तक कोविड से पीड़ित रहने से लोग अत्यधिक थकान महसूस करते हैं...।’’
अध्ययन में, 3,750 से अधिक मरीजों के जीवन पर दीर्घकालिक कोविड के प्रभाव की पड़ताल की गई। उनसे उनके उपचार के दौरान उपयोग किये गये डिजिटल ऐप पर इस बारे में सवाल पूछे गये कि लंबे समय से कोरोना वायरस से संक्रमित रहने ने उनके रोजमर्रा के जीवन, थकान के स्तर, अवसाद, बेचैनी, सांस लेने और जीवन की गुणवत्ता को किस तरह से प्रभावित किया है।
‘बीएमजे ओपन’ जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के सह लेखक एवं यूसीएल के हेनरी गुडफेलो ने कहा, ‘‘हमारे नतीजे में पाया गया कि लंबे समय तक कोरोना वायरस से संक्रमित रहने से मरीजों के जीवन पर भयावह प्रभाव पड़ा--थकान का सबसे अधिक असर काम करने और करीबी संबंध बरकरार रखने जैसी सामाजिक गतिविधियों से लेकर हर चीज पर पड़ा।’’
शोधार्थियों का मानना है कि लोगों के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने के साथ-साथ कोविड देश की अर्थव्यवस्था और समाज को भी प्रभावित कर रहा है।
लंबे समय तक कोविड से पीड़ित रहे मरीज, ऐसे लोगों को माना जाता है जिनमें गंभीर संक्रमण के बाद कम से कम 12 हफ्तों तक इसके लक्षण रहे हों।
प्रश्नावली का जवाब देने वालों में 90 प्रतिशत लोगों में 51 प्रतिशत ने बताया कि पिछले महीने कम से कम एक दिन काम नहीं कर सकें और 20 प्रतिशत लोग एक भी दिन काम नहीं कर सकें। अध्ययन में 18 से 65 वर्ष आयुवर्ग के लोगों को शामिल किया गया था। साथ ही, 71 प्रतिशत मरीज महिलाएं थीं।
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