देश की खबरें | यमुना की सफाई में सबसे बड़ी चुनौती “आधिकारिक उदासीनता” से पार पाना है : एनजीटी समिति

नयी दिल्ली, पांच जुलाई राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) द्वारा गठित एक समिति ने कहा कि यमुना की सफाई की निगरानी में सबसे बड़ी चुनौती “आधिकारिक उदासीनता” है क्योंकि वैधानिक प्रावधानों और काफी उपदेशों के बावजूद जल प्रदूषण प्राथमिकता नहीं है।

एनजीटी के विशेषज्ञ सदस्य बी एस साजवान और दिल्ली की पूर्व मुख्य सचिव शैलजा चंद्रा की दो सदस्यीय यमुना निगरानी समिति ने एनजीटी को सौंपी अपनी अंतिम रिपोर्ट में बीते 23 महीनों के दौरान अपने इस अनुभव के बारे में जिक्र किया।

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समिति ने कहा, “आधिकारिक उदासीनता पर काबू पाना सबसे बड़ी चुनौती है। यह एनजीटी के निर्देशों को पूरा करने या यमुना निगरानी समिति के प्रयासों को विफल करने के लिये किसी अवज्ञा या अनिच्छा की वजह से नहीं बल्कि इसलिये है क्योंकि जल प्रदूषण तमाम वैधानिक प्रावधानों और उपदेशों के बावजूद प्राथमिकता नहीं है।”

उसने कहा, “दूसरी बात यह कि रखरखाव के काम को राजनीतिक स्तर पर नई आधारभूत परियोजनाओं या योजनाओं के मुकाबले कम महत्व दिया जाता है। यह अधिकारियों और अभियंताओं के दिमाग में बैठ गया है कि जिस मानक पर उनके प्रदर्शन को आंका जाएगा वह मुख्य रूप से अधिकारी की नई परियोजनाओं को मंजूरी दिलाने, उसके लिये कोष हासिल करने और समय पर सामान व सेवाएं हासिल करने की उसकी क्षमता पर निर्भर करता है।”

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यमुना निगरानी समिति ने अधिकरण को बताया कि नागरिकों को प्रभावित करने वाले जीवन की गुणवत्ता संबंधी मुद्दे अकसर पृष्ठभूमि में चले जाते हैं और दैनिक रखरखाव के मामलों को निपटाने के लिये कनिष्ठ लोगों पर छोड़ दिया जाता है।

समिति ने कहा कि स्वच्छ यमुना के लिये ज्यादा बड़े स्तर पर जनता की भागीदारी जरूरी है और इसे हासिल करने के लिये नागरिकों को सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

उसने कहा, “नदी को साफ करने को सरकार के चुनावी वादों की सूची में इस साल शामिल किया गया था और समिति को बताया गया था कि राजनीतिक स्तर पर भी इस पर ध्यान दिया जाना शुरू हो चुका है। लेकिन मौजूदा स्वास्थ्य संकट की वजह से यह एक बार फिर पीछे छूट गया है।”

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