नयी दिल्ली, 21 अगस्त उच्चतम न्यायालय ने एक बलात्कार पीड़िता को यह कहते हुए गर्भपात कराने की अनुमति दी कि वह इस प्रक्रिया के लिए चिकित्सकीय रूप से फिट है और इससे गर्भधारण करने की उसकी क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। पीड़िता 27 सप्ताह की गर्भवती है।
शीर्ष अदालत ने साथ ही यह भी कहा कि यौन उत्पीड़न के मामलों में गर्भधारण पीड़ितों के लिए तनाव और आघात का कारण हो सकता है।
गर्भ का चिकित्सकीय समापन (एमटीपी) अधिनियम के तहत, गर्भपात की ऊपरी सीमा विवाहित महिलाओं तथा बलात्कार पीड़िता सहित विशेष श्रेणियों एवं दिव्यांग एवं नाबालिगों के लिए 24 सप्ताह है।
पीड़िता की चिकित्सकीय रिपोर्ट पर गौर करते हुए न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि गुजरात उच्च न्यायालय ने एमटीपी के अनुरोध को खारिज करके सही नहीं किया।
शीर्ष अदालत ने कहा कि भारतीय समाज में विवाह संस्था के तहत गर्भावस्था न केवल जोड़े के लिए बल्कि उनके परिवार और दोस्तों के लिए भी खुशी और उत्सव का कारण होता है।
न्यायालय ने कहा, ‘‘इसके विपरीत विवाह से इतर खासकर यौन उत्पीड़न के मामलों में गर्भधारण तनाव और आघात का कारण हो सकता है। ऐसा गर्भधारण न केवल गर्भवती महिलाओं के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है, बल्कि उनकी चिंता एवं मानसिक पीड़ा का कारण भी होता है। किसी महिला पर यौन हमला अपने आप में तनावपूर्ण होता है और यौन उत्पीड़न के कारण गर्भधारण के विपरीत परिणाम हो सकते हैं, क्योंकि ऐसा गर्भधारण स्वैच्छिक नहीं होता है।’’
पीठ ने कहा, ‘‘उपरोक्त चर्चा और चिकित्सीय रिपोर्ट के मद्देनजर हम याचिकाकर्ता को गर्भपात की अनुमति देते हैं। हम निर्देश देते हैं कि वह कल अस्पताल में उपस्थित रहे, ताकि गर्भपात की प्रक्रिया की जा सके।’’
शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि भ्रूण जीवित पाया जाता है, तो अस्पताल यह सुनिश्चित करेगा कि भ्रूण को जीवित रखने के लिए हर आवश्यक सहायता प्रदान की जाए। शिशु अगर जीवित रहता है तो राज्य यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाएगा कि बच्चे को कानून के अनुसार गोद लिया जाए।
एक विशेष बैठक में शीर्ष अदालत ने शनिवार को गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा पीड़िता की चिकित्सकीय गर्भपात संबंधी याचिका पर सुनवाई स्थगित करने पर नाराजगी व्यक्त की और कहा कि मामले के लंबित रहने के दौरान ‘‘कीमती वक्त’’ बर्बाद हो गया।
बाद में उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने शनिवार को गर्भपात की अनुमति के अनुरोध वाली याचिका खारिज कर दी।
उच्च न्यायालय के आदेश पर प्रतिक्रिया जताते हुए, शीर्ष अदालत ने सोमवार को कहा, ‘‘हम उच्चतम न्यायालय के आदेश के प्रतिक्रियास्वरूप उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश का मूल्यांकन नहीं कर रहे। इसे हमारे संज्ञान में लाने के लिए धन्यवाद, लेकिन क्या आप समर्थन कर रहे हैं? गुजरात उच्च न्यायालय में क्या हो रहा है? क्या न्यायाधीश किसी ऊपरी अदालत के आदेश का इसी तरह जवाब देते हैं?’’
शीर्ष अदालत जानना चाहती थी कि उच्च न्यायालय को एक ऊपरी अदालत द्वारा निस्तारित किये गये मामले में आदेश पारित करने की क्या आवश्यकता थी।
पीठ ने कहा, ‘‘इस प्रकार के प्रयास हमारे आदेश को दरकिनार करने के लिए उच्च न्यायालयों द्वारा किये जा रहे हैं। भारत में कोई भी अदालत दूसरे पक्ष को नोटिस दिये बिना किसी ऊपरी अदालत के आदेश के खिलाफ शनिवार को इस तरह का आदेश पारित नहीं कर सकती है।’’ पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण संवैधानिक दर्शन के विरुद्ध है।
गुजरात सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अदालत की सहायता करने में कुछ भ्रांति हो सकती है। इसके साथ ही उन्होंने पीठ से अनुरोध किया कि वह उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी न करे।
पीड़िता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील संजय पारिख ने पीठ से भ्रूण से निकाले गए ऊतक को संरक्षित रखने का आग्रह किया, जिसे मुकदमे में सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
पीठ ने कहा कि अदालत कोई चिकित्सा विशेषज्ञ नहीं है और वह केवल संबंधित चिकित्सा विशेषज्ञों को ऐसी प्रक्रिया की व्यवहार्यता का ध्यान रखने का निर्देश दे सकती है।
पीठ ने कहा कि यह कहने की जरूरत नहीं है कि इसे (ऊतक) संबंधित अस्पताल द्वारा डीएनए परीक्षण के उद्देश्य से जांच एजेंसी को सौंप दिया जाएगा।
शीर्ष अदालत ने बलात्कार पीड़िता की याचिका पर निर्णय लेने में गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा की गई देरी पर अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा था कि ऐसे मामलों में तात्कालिकता की भावना होनी चाहिए, और इसे किसी सामान्य मामला के तौर पर लेने और सुनवाई स्थगित करने के उच्च न्यायालय के "उदासीन रवैये" की आलोचना की थी।
शनिवार को सुनवाई के दौरान, 25 वर्षीय महिला के वकील ने शीर्ष अदालत को सूचित किया था कि उसने सात अगस्त को उच्च न्यायालय का रुख किया था और मामले की सुनवाई अगले दिन हुई थी।
उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय ने आठ अगस्त को गर्भावस्था की स्थिति के साथ-साथ याचिकाकर्ता की स्थिति का पता लगाने के लिए एक मेडिकल बोर्ड के गठन का निर्देश जारी किया था। वकील ने कहा कि रिपोर्ट संबंधित मेडिकल कॉलेज द्वारा 10 अगस्त को प्रस्तुत की गई थी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि रिपोर्ट को उच्च न्यायालय ने 11 अगस्त को रिकॉर्ड पर लिया था, लेकिन "अजीब बात" है कि मामले को 12 दिन बाद 23 अगस्त को सूचीबद्ध किया गया, "इस तथ्य को नजरअंदाज करते हुए कि हर दिन की देरी मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बहुत महत्वपूर्ण थी।’’
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