देश की खबरें | सुदर्शन टीवी को कार्यक्रम संहिता के उल्लंघन के लिये कारण बताओ नोटिस, केन्द्र ने न्यायालय को बताया
एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 23 सितंबर केन्द्र ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय को सूचित किया कि उसने सुदर्शन टीवी के ‘बिन्दास बोल’ कार्यक्रम को पहली नजर में कार्यक्रम संहिता का उल्लंघन करने वाला पाया है और उसे कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि इस कारण बताओ नोटिस के आलोक में चैनल के खिलाफ सरकार की कार्रवाई न्यायालय के आदेश के दायरे में होगी।

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न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा और न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की पीठ को सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने यह जानकारी दी और कहा कि सुदर्शन टीवी को कारण बताओ नोटिस का जवाब 28 सितंबर तक देना है और जवाब नहीं मिलने पर उसके खिलाफ एकपक्षीय निर्णय लिया जायेगा।

पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘‘आज सुनवाई के दौरान सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि केन्द्र सरकार ने केबल टेलीविजन नेटवर्क्स (नियमन)कानून, 1995 की धारा 20 (3) में प्रदत्त अधिकार का इस्तेमाल करते हुये सुदर्शन न्यूज को 23 सितंबर को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।’’

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आदेश में आगे कहा गया है कि चूंकि इस नोटिस का जवाब 28 सितंबर तक देना है, मेहता ने पेश मामले की सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध किया है ताकि केन्द्र सरकार इस मामले में सुविचारित दृष्टिकोण अपना सके।

न्यायालय ने कहा कि चूंकि नोटिस जारी कर दिया गया है, इसलिए सुनवाई पांच अक्टूबर के लिये स्थगित की जा रही है।

पीठ ने कहा, ‘‘नोटिस के साथ कानून के अनुसार निबटा जायेगा और केन्द्र सरकार इस नोटिस के नतीजे के बारे में न्यायालय में एक रिपोर्ट पेश करेगी।’’

पीठ ने कहा कि इस कार्यक्रम की शेष कड़ियों के प्रसारण पर रोक लगाने संबंधी 15 सितंबर का आदेश अगले आदेश तक प्रभावी रहेगा।

मेहता ने वीडियो कॉन्फ्रेंस से मामले की संक्षिप्त सुनवाई के दौरान कहा कि कार्यक्रम संहिता के उल्लंघन के बारे में सुदर्शन टीवी को भेजे गये चार पन्ने के कारण बताओ नोटिस का लिखित जवाब मांगा गया है।

यह नोटिस केबल टेलीविजन नेटवर्क कानून, 1995 के तहत आज ही दिया गया है। सरकार के अनुसार इस कार्यक्रम में दर्शाये गये तथ्य पहली नजर में कार्यक्रम संहिता के अनुरूप नहीं हैं।

पीठ ने टिप्पणी की कि अगर इस मामले की सुनवाई नहीं हो रही होती तो इसकी सारी कड़ियों का प्रसारण हो गया होता।

इससे पहले, सुनवाई शुरू होते ही न्यायालय ने इसमें हस्तक्षेप के लिये आवेदन करने वालों से कहा कि वे लिखित दलीलें पेश करें।

न्यायालय ने 21 सितंबर को नौकरशाही में मुस्लिमों की कथित घुसपैठ के बारे में सुदर्शन टीवी के कार्यक्रम ‘बिन्दास बोल’ को नियंत्रित करने के स्वरूप को लेकर काफी माथापच्ची की थी और कहा था कि वह बोलने की आजादी में कटौती नहीं करना चाहता है क्योंकि यह ‘विदेशी फंडिंग’ और ‘आरक्षण’ से जुड़े मुद्दों का जनहित का कार्यक्रम है।

न्यायालय नफरत फैलाने वाले भाषण जैसे कई मुद्दों को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान पहले ही ‘यूपीएससी जिहाद’ की कड़ियों के प्रसारण पर रोक लगा चुका है। परंतु वह इस बात से नाराज है कि चैनल ने अपने हलफनामे में एक अंग्रेजी समाचार चैनल के उन दो कार्यक्रमों का क्यों उल्लेख किया जो ‘हिन्दू आतंकवाद’ के बारे में थे।

पीठ ने सुदर्शन न्यूज चैनल से सवाल किया था, ‘‘आपने अंग्रेजी न्यूज चैनल के कार्यक्रमों के बारे में क्यों कहा। आपसे किसने कार्यक्रम के बारे में राय मांगी थी।’’

चैनल के प्रधान संपादक सुरेश चव्हाणके के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने कहा कि उनके हलफनामे में ‘हिन्दू आतंकवाद’ पर अंग्रेजी चैनल के कार्यक्रम का जिक्र है क्योंकि उनसे पहले पूछा गया था कि ‘यूपीएससी जिहाद’ कड़ियों में क्यों मुस्लिम व्यक्तियों को टोपी और हरा रंग धारण किये दिखाया गया है।

पीठ ने सवाल किया था, ‘‘क्या इसका मतलब यह है कि हर बार जब न्यायाधीश सवाल पूछेंगे तो आप अपना दृष्टिकोण बतायेंगे? अगर यही मामला है तो न्यायाधीश सवाल पूछना बंद कर देंगे। आपसे उन सभी सवालों का जवाब दाखिल करने की अपेक्षा नहीं की जाती है, जो न्यायाधीश पूछते हैं। न्यायाधीश तो बेहतर जानकारी प्राप्त करने लिये सवाल करते हैं।’’

अनूप

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