बंगोर (ब्रिटेन), 24 अगस्त (द कन्वरसेशन) अच्छा श्रोता होने का अर्थ है समानुभूति होना,लेकिन समानुभूति ऐसा गुण है जिसका सुनने के संदर्भ में सबसे गलत अर्थ समझा जाता है।
समानुभूति का तात्पर्य यह है कि जब हम किसी अन्य व्यक्ति के दृष्टिकोण से दुनिया को समझने की कोशिश करते हैं तो उस वक्त हम क्या महसूस करते हैं।
समानुभूति के बारे में आम गलतफहमियों में से एक यह है कि दूसरे व्यक्ति ने जो अनुभव किया है उसे समझने के लिए आपको उससे गुजरना होगा। दो लोग समान चुनौतियों और मुश्किलों से गुजर सकते हैं लेकिन हो सकता है कि उनका रवैया एकदम भिन्न हो। आपके अनुभव आपके लिए खास हो सकते हैं और कोई अन्य यह नहीं जान सकता कि आप क्या महसूस कर रहे हैं। कोई कैसा महसूस कर रहा है यह जानने का एकमात्र तरीका यही है कि उसे सुना जाए ।
तो आइए समानुभूति को अलग तरीके से समझते हैं।
दुनिया को लेकर आपका खास नजरिया
कल्पना कीजिए कि प्रत्येक शिशु एक लकड़ी का फ्रेम पकड़े पैदा हुआ है,जिसमें एक शीशा लगा है। जब वे दुनिया में किसी भी चीज को देखते हैं तो उसी शीशे के जरिए देखते हैं। ये शीशा पूरी तरह से साफ नहीं है। इसका रंग उड़ा हुआ है, इसपर कुछ चिपका हुआ है और ये उनके अनुवांशिकी तथा जीव विज्ञान के निशान हैं।
इसका अर्थ है कि हर एक के पास अलग प्रकार का शीशा है,जिसके जरिए वह दुनिया को देखता है। जैसे-जैसे हम अपने जीवन में आगे बढ़ते हैं इन शीशों में और निशान आते जाते हैं।
हर अच्छा और बुरा अनुभव शीशे को बदलता है और जब वक्त के साथ शीशा बदलता है तो दुनिया को लेकर हमारे विचार भी बदलते हैं।
हम दुनिया को उस प्रकार से नहीं देखते जैसी वह है,बल्कि हम उसे हमारे जीव विज्ञान और जीवन के अनुभवों से बने फिल्टर के जरिए देखते हैं।
संदर्भ का फ्रेम
काउंसलर्स अक्सर मरीजों के संदर्भ के ढांचे के जरिए देखने की बात कहते हैं। लकड़ी के ढांचे में लगा शीशा आपके संदर्भ का ढांचा है।
अच्छा श्रोता होने के लिए आपको वक्ता की ओर खड़े होने की जरूरत है और दुनिया को उसके शीशे से देखने की जरूरत है।
यह मत कहिए,‘‘ क्षमा करें, आपका शीशा धुंधला है।’’ यह सहानुभूति होगी,जो खराब नहीं है लेकिन सुनने के क्रम में मददगार नहीं है।
सहानुभूति का अर्थ है कि अगले व्यक्ति के लिए आपके मन में दुख है और आप उसकी मुश्किलें कम करना चाहते हैं। यह तरीका है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप उनकी जरूरतों,भावनाओं और अनुभवों को समझते हैं।
श्रोता बनना सीखना
जब आप जिससे बात कर रहे हैं उसके तरीके से दुनिया को देखने की कोशिश करेंगे तो आप पाएंगे कि गलतफहमी होने की संभावना कम है और बाहरी स्तर पर जुड़ाव की संभावना अधिक।
काउंसलर्स मरीजों के साथ इसी प्रकार से उपचारात्मक संबंध बनाते हैं।
जब आप ध्यान से सुनते हैं तो उस दुनिया में पहुंच जाते हैं जहां वक्ता है और यही आपको अच्छा श्रोता बनाता है।
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