नयी दिल्ली, तीन मार्च दिल्ली उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि अतिक्रमण के मुद्दे पर दक्षिणी दिल्ली नगर निगम (एसडीएमसी) द्वारा नरम रुख अपनाने से लोग सरकारी जमीन पर कब्जा करने के लिए प्रोत्साहित हुए हैं। अदालत ने एसडीएमसी को यहां वसंत विहार क्षेत्र में घरों के बाहर बनाए गए रैंप को हटाने में प्राधिकारियों की विफलता का जवाब देने के लिए उसके सामने उपस्थित रहने को कहा।
उच्च न्यायालय ने कहा कि अदालत के आदेश के बावजूद प्राधिकारियों द्वारा कार्रवाई नहीं की गई और यह "कर्तव्य की अवहेलना’’ के समान है।
न्यायमूर्ति वजीरी ने कहा कि ढाई महीने बीत चुके हैं और एसडीएमसी ने क्षेत्र में देखे गए रैंपों को न तो ध्वस्त किया है और न ही हटाया है। उन्होंने कहा कि निष्क्रियता ने निगम के फुटपाथों को व्यापक नुकसान और आम जनता को असुविधा को प्रोत्साहित किया है।
अदालत ने कहा कि एसडीएमसी द्वारा इस मुद्दे के ‘‘नरम रुख’’ से पता चलता है कि इसने लोगों को सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया है, जिससे दिव्यांगों, बुजुर्गों और टहलने के इच्छुक बच्चों को बहुत परेशानी होती है।
अदालत भावरीन कंधारी द्वारा दायर एक अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिनका प्रतिनिधित्व अधिवक्ता आदित्य एन प्रसाद ने किया। इसमें आरोप लगाया गया कि दक्षिण दिल्ली के वसंत विहार में सैकड़ों पेड़ों के आसपास के क्षेत्र को कंक्रीट से भर दिया गया है। अर्जी में इन वृक्षों के संरक्षण का अनुरोध किया गया।
अदालत ने पहले एसडीएमसी को वसंत विहार इलाके में सामाजिक विकलांगता ऑडिट को उचित तरीके से करने के लिए कहा था, जहां उसके अधिकारी व्हीलचेयर पर चले थे, लेकिन स्वतंत्र रूप से नहीं बल्कि सहायता से।
इसने यह भी सवाल किया था कि कई घरों के बाहर बने रैंप एसडीएमसी के मानकों के अनुरूप क्यों नहीं थे और अधिकारियों से उन्हें हटाने के लिए कहा था ताकि व्हीलचेयर या वॉकर पर व्यक्तियों के लिए कोई बाधा न हो।
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)













QuickLY