बेंगलुरु, 18 जून कर्नाटक उच्च न्यायालय ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के मामले में एक अभियुक्त को दी गई माफी को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि क्षमा स्वीकार्य है यदि सरकारी गवाह की गवाही से मामले में उन अभियुक्तों के खिलाफ मुकदमा चलाने में मदद मिलती हो जिन्हें अन्य तरीकों से दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
श्री लाल महल लिमिटेड, नई दिल्ली के 73 वर्षीय निदेशक सुशील कुमार वलेचा को माफी देने संबंधी बेंगलुरु की विशेष अदालत के आदेश को सह-आरोपी मैसर्स श्री मल्लिकार्जुन शिपिंग प्राइवेट लिमिटेड और कंपनी के प्रबंध निदेशक सतीश कृष्ण सैल ने चुनौती दी थी।
उच्च न्यायालय ने मामले में निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि माफी स्वीकार्य है।
विशेष अदालत ने सात अक्टूबर, 2021 को वलेचा की दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 306 के तहत मामले में सरकारी गवाह बनने पर माफी की अर्जी मंजूर कर ली थी।
सैल कारवार से कांग्रेस के मौजूदा विधायक हैं। अवैध लौह अयस्क खनन से जुड़ा यह मामला 2012 का है। सीबीआई द्वारा कई अभियुक्तों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था जिसने मामले की जांच की और आरोपपत्र दायर किया।
कई अभियुक्तों ने मामले से रिहाई के लिए अर्जी दायर की लेकिन उन सभी को खारिज कर दिया गया। निचली अदालत ने आरोपियों के खिलाफ आईपीसी और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत आरोप तय किए।
वलेचा ने तब माफी मांगने के लिए एक आवेदन दायर किया, जिसमें कहा गया कि वह केवल श्री मल्लिकार्जुन शिपिंग प्राइवेट लिमिटेड के कर्मचारी थे और वह सरकारी गवाह बनना चाहते हैं। सीबीआई ने एक ज्ञापन दायर किया जिसमें कहा गया कि उसे कोई आपत्ति नहीं है। ऐसे में उनका आवेदन मंजूर किया गया।
उच्च न्यायालय ने 16 जून को अपने फैसले में कहा कि निचली अदालत का आदेश उचित था।
उच्चतम न्यायालय के पहले के फैसलों का हवाला देते हुए, उच्च न्यायालय ने कहा कि माफी के लिए आवेदन पर विचार किया जा सकता है, यदि यह अभियोजन पक्ष के मामले में मदद करता है।
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