जयपुर, दो फरवरी लेखक एवं पर्यावरण संरक्षणवादी मार्टिन गुडमैन ने बिश्नोई समुदाय के नियमों तथा पर्यावरण संरक्षण को लेकर पूरी दुनिया को दी गई सीख पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह समुदाय आज भी अपने संस्थापक गुरु जम्भेश्वर या जम्भोजी की ओर बनाए गए 29 नियमों का पालन करता है जिनमें से एक पेड़ों का संरक्षण है।
राजस्थान के जोधपुर के पास खेजड़ी के पेड़ों के संरक्षण के लिए 1730 में बिश्नोई समुदाय के 363 लोगों की शहादत की कहानी को पर्यावरण संरक्षण के पहले आंदोलन में से एक माना जाता है, जिसने ‘चिपको आंदोलन’ को जन्म दिया।
‘जयपुर साहित्य महोत्सव’ (जेएलएफ) में ‘द फर्स्ट इको-वॉरियर्स: द एक्स्ट्राऑर्डिनरी स्टोरीज ऑफ द बिश्नोई’ नाम के सत्र को संबोधित करते हुए गुडमैन ने कहा, ‘‘15वीं शताब्दी में जम्भोजी ने भयंकर सूखे के समय में जीवन यापन के लिए 29 नियम बनाए थे। यह वह समय था यूरोप में सबसे बड़ा सूखा पड़ा था और हर जगह इसी तरह के हालात थे।’’
उन्होंने कहा कि प्रतिकूल मौसम में भी राजस्थान में अच्छे से जीवन यापन करने का एक कारण यह है कि ‘‘पीढ़ी दर पीढ़ी बिश्नोई समुदाय के लोग उन नियमों का पालन करते आ रहे हैं।’’
गुडमैन ने कहा, ‘‘मैं उस पेड़ के नीचे बैठा था जहां जम्भोजी का निधन हुआ। यह बात 2022 की है। उस दिन राजस्थान में 37 डिग्री तापमान था, लंदन में पहली बार 40 (डिग्री) तापमान था।’’
‘माई हेड फॉर ए ट्री: द एक्स्ट्राऑर्डिनरी स्टोरी ऑफ द बिश्नोई, द वर्ल्ड्स फर्स्ट इको-वॉरियर्स’ के लेखक ने कहा, ‘‘जिस तरह से जम्भोजी ने एक महान विचारक और एक महान आध्यात्मिक नेता के रूप में नेतृत्व किया, मुझे लगता है कि राजस्थान के पास अहम सीख है जो हम सभी को पाठ पढ़ाती है।’’
गुडमैन ने कहा, ‘‘लाखों लोग अपनी जमीन को रेगिस्तान में बदलते हुए देखेंगे।’’ उन्होंने कहा कि बिश्नोई समुदाय के लोग जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में पर्यावरण सरंक्षण में काफी विश्वास रखते हैं।
लेखक ने कहा, ‘‘वे इस चीज (जलवायु परिवर्तन) से निपटने की कोशिश में ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगा रहे हैं। इसलिए आप देखेंगे कि जंगल बढ़ रहे हैं, वे वन्यजीवों के लिए तालाब बना रहे हैं।’’
सत्र में गुडमैन के साथ एक सरकारी शिक्षक एवं एक पर्यावरण कार्यकर्ता नरेंद्र बिश्नोई भी शामिल हुए।
बिश्नोई ने आगाह किया कि विकास के नाम पर पेड़ों को नहीं काटा जाना चाहिए।
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