प्रवासी श्रमिक त्रासदी को दर्शाती तस्वीर: बेटे की मौत से पहले उससे मिल भी ना सका रामपुकार
जमात

नयी दिल्ली, 17 मई महानगर दिल्ली की एक सड़क के किनारे बैठा रामपुकार पंडित मोबाइल फोन पर बात करते हुए ज़ार ज़ार रो रहा है। उसकी यह दारूण तस्वीर देशभर के प्रवासी श्रमिकों का प्रतीक बन गयी है।

समूचे देश में जब प्रवासी श्रमिकों के समक्ष अस्तित्व का संकट गहराता जा रहा है तो वहीं मीडिया में रामपुकार की यह तस्वीर खूब साझा की जा रही है।

लेकिन तमाम सुर्खियों के बावजूद वह अपने परिवार से अभी तक मिल नहीं पाया है और अपने एक साल के बेटे की मौत से पहले उसकी सूरत तक न देख पाने के दुख ने उसे तोड़कर रख दिया है।

कोरोना वायरस संक्रमण को काबू करने के लिए देश में लागू लॉकडाउन के कारण पैदा हुए प्रवासी संकट को दर्शाती इस तस्वीर को देश के हजारों लोग पहचानते हैं। इस तस्वीर में बेतहाशा रोता नजर आ रहा प्रवासी श्रमिक रामपुकार भले ही अपने मूल राज्य बिहार पहुंच गया है लेकिन वह अभी तक अपने परिवार से मिल नहीं पाया है।

‘पीटीआई’ के फोटो पत्रकार अतुल यादव ने दिल्ली के एक सिनेमा हॉल में काम करने वाले रामपुकार को दिल्ली में निजामुद्दीन पुल के किनारे देखा । वह उस समय फोन पर अपने परिजनों से बात करते हुए बेतहाशा रो रहा था। उसी दौरान फोटो पत्रकार ने उसकी तस्वीर ली थी, जो देश में प्रवासी संकट का चेहरा बन गई है।

दिल्ली से करीब 1,200 किलोमीटर दूर बेगुसराय में अपने घर पहुंचने के लिए जूझ रहे 38 वर्षीय रामपुकार की तस्वीर को मीडिया में साझा किए जाने के बाद उसे बिहार तक पहुंचने में मदद मिल गई। वह इस समय बेगुसराय के बाहर एक गांव के स्कूल में पृथक-वास केंद्र में रह रहा है।

रामपुकार इस बात से दुखी है कि वह अपने बच्चे की मौत से पहले घर नहीं पहुंच सका और उसे आखिरी बार देख भी न सका।

यह तस्वीर लिए जाने के कुछ ही देर बाद उसके बेटे की मौत हो गई थी।

रामपुकार ने ‘पीटीआई ’ से फोन पर कहा, ‘‘हम मजदूरों का कोई जीवन नहीं है।’’

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