प्रयागराज, नौ दिसंबर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि भले ही एक शादीशुदा हिंदू व्यक्ति ने अपनी पत्नी को छोड़ रखा है और वह उससे अलग जीवनयापन कर रहा है, लेकिन उसे तलाक नहीं दिया है, तो भी हिंदू दत्तक ग्रहण एवं गुजारा कानून के तहत एक बच्चे को गोद लेने के लिए उसे अपनी विरक्त पत्नी की पूर्व सहमति प्राप्त करना आवश्यक है।
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर ने मऊ के भानु प्रताप सिंह द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश पारित किया।
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सिंह ने अपने चाचा राजेंद्र सिंह की मृत्यु के बाद प्रदेश के वन विभाग में अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति का अनुरोध किया था।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, राजेंद्र सिंह ने 2001 में उसे गोद लिया था। राजेंद्र सिंह ने अपनी पत्नी फूलमती को छोड़ दिया था और इस दंपति की कोई संतान नहीं थी।
याचिका के मुताबिक, ऐसे में वह अनुकंपा के आधार पर नौकरी के लिए पात्र था क्योंकि वह राजेंद्र सिंह का अकेला वारिस था और उन पर निर्भर था। राजेंद्र सिंह मृत्यु के समय वन विभाग के कर्मचारी थे।
वन विभाग ने 17 दिसंबर, 2016 को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति की याचिकाकर्ता की अर्जी खारिज कर दी जिसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी।
अदालत ने गत 25 नवंबर को वन विभाग द्वारा पारित आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और कहा कि गोद लेने की व्यवस्था कानून के मुताबिक नहीं थी।
अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कहा, “एक हिंदू पुरुष के लिए यह आवश्यक है कि बच्चा गोद लेने के लिए वह अपनी पत्नी की पूर्व अनुमति ले। इसमें कोई संदेह नहीं कि श्रीमती फूलमती राजेंद्र सिंह की मृत्यु होने तक उसकी पत्नी थी और दोनों के बीच कभी तलाक नही हुआ था, भले ही वे अलग अलग रह रहे थे।”
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