देश की खबरें | मणिपुर: मेइती आरक्षण संबंधी आदेश पर शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीश से नाखुशी जताई

नयी दिल्ली, 17 मई उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को मणिपुर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एमवी मुरलीधरन की यह कहते हुए आलोचना की कि अवसर दिए जाने के बावजूद उन्होंने हिंसाग्रस्त राज्य में बहुसंख्यक मेइती समुदाय को आरक्षण देने संबंधी अपने फैसले को सही नहीं किया।

आदिवासी 27 मार्च के न्यायमूर्ति मुरलीधरन के मणिपुर उच्च न्यायालय के आदेश के बाद मेइती समुदाय को आरक्षण का विरोध कर रहे हैं।

उच्च न्यायालय ने समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग पर राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर केंद्र को सिफारिश भेजने को कहा था।

प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली पीठ ने 27 मार्च के आदेश को "अनुचित" करार देते हुए कहा, "मैं आपको (वकीलों को) एक बात बताना चाहता हूं कि उच्च न्यायालय का आदेश गलत था ... मुझे लगता है कि हमें उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगानी होगी। उच्च न्यायालय का आदेश बिलकुल गलत है। हमने न्यायमूर्ति मुरलीधरन को खुद को सही करने का समय दिया लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।’’

मणिपुर हिंसा से संबंधित मामलों की सुनवाई की शुरुआत में, पीठ का विचार था कि वह न्यायमूर्ति मुरलीधरन द्वारा पारित मणिपुर उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश की पीठ के आदेश को रद्द कर देगी।

हालांकि, बाद में इसने कहा कि कुकी सहित आदिवासी लोग एकल न्यायाधीश पीठ के आरक्षण संबंधी आदेश को चुनौती देने वाली अंतर-अदालत अपील की सुनवाई कर रही उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष कार्यवाही में शामिल हो सकते हैं।

न्यायमूर्ति मुरलीधरन पूर्व में उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम द्वारा मद्रास उच्च न्यायालय से मणिपुर उच्च न्यायालय में अपने स्थानांतरण का विरोध करने की वजह से खबरों में थे।

कॉलेजियम ने 15 जनवरी, 2019 के अपने प्रस्ताव में मणिपुर उच्च न्यायालय में उनके स्थानांतरण की सिफारिश की थी।

बाद में, न्यायमूर्ति मुरलीधरन ने अनुरोध किया कि उन्हें मद्रास उच्च न्यायालय में बनाए रखा जाए या वैकल्पिक रूप से, कर्नाटक या आंध्र प्रदेश या केरल या उड़ीसा उच्च न्यायालय में स्थानांतरित किया जाए।

हालांकि, शीर्ष अदालत कॉलेजियम अपने पहले के फैसले पर कायम रही और उन्हें मणिपुर उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने की अपनी सिफारिश को दोहराने का फैसला किया।

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