नयी दिल्ली, 25 फरवरी भारत भर में कम से कम 35 प्रतिशत स्कूलों में पचास या उससे कम छात्र नामांकित हैं तथा उनमें मात्र एक या दो शिक्षक हैं। ‘पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च’ नामक संस्था के विश्लेषण में यह जानकारी सामने आई।
नीति आयोग के अनुसार, भारत में 36 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में 50 से कम विद्यार्थी हैं तथा लगभग 10 प्रतिशत स्कूलों में 20 से कम विद्यार्थी हैं।
मंगलवार को जारी विश्लेषण रिपोर्ट में कहा गया, “इन विद्यालयों में महज एक या दो शिक्षक हैं। छोटे स्कूल, जिनमें आमतौर पर कम शिक्षक होते हैं, उनके सामने कई समस्याएं आती हैं। एनईपी (2020) के अनुसार, इसके कारण शिक्षकों को कई कक्षाओं में अलग-अलग विषय पढ़ाने पड़ते हैं, जिनमें वे विषय भी शामिल होते हैं जिनमें हो सकता है वे पर्याप्त रूप से योग्य न हों।”
इसमें कहा गया, “इसके अलावा, शिक्षक अपना अधिकांश समय प्रशासनिक कार्यों में बिताते हैं, जिससे शिक्षण समय प्रभावित होता है। नयी शिक्षा नीति में कहा गया है कि छोटे और अलग-अलग स्कूलों का प्रबंधन करना मुश्किल है। इनमें प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों जैसी बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है।”
वर्ष 2022-23 तक कक्षा 1-8 तक के लिए 16 प्रतिशत शिक्षण पद रिक्त थे। झारखंड (40 प्रतिशत), बिहार (32 प्रतिशत), मिजोरम (30 प्रतिशत) और त्रिपुरा (26 प्रतिशत) में रिक्तियां काफी अधिक थीं।
रिपोर्ट में कहा गया, “2023-24 तक प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक स्तर तक लगभग 12 प्रतिशत शिक्षकों के पास पेशेवर शिक्षण योग्यता का अभाव है। शिक्षा मंत्रालय (2023-24) के अनुसार, पूर्व-प्राथमिक स्तर पर 48 प्रतिशत शिक्षक अयोग्य हैं।”
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)












QuickLY