नयी दिल्ली, 21 जुलाई राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने मंगलवार को कहा कि कोविड-19 कचरे को अन्य कचरे से अलग किया जाना चाहिए जिससे कि सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले और अधिक प्रदूषण से बचा जा सके।
एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने उल्लेख किया कि देश में हर रोज कोविड-19 से संबंधित लगभग 101 मीट्रिक टन जैवचिकित्सा कचरा उत्पन्न हो रहा है।
इसने कहा कि रोगियों और संबंधित कर्मियों तथा पेशेवरों को इस तरह के संक्रामक कचरे के खतरे की आशंका के मद्देनजर इस तरह के कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन आवश्यक है।
अधिकरण ने कहा, ‘‘यह मात्रा हर रोज उत्पन्न होने वाले 609 मीट्रिक टन सामान्य जैव चिकित्सा कचरे के अतिरिक्त है। लगभग 195 जैवचिकित्सा कचरा शोधन एवं निपटान प्रतिष्ठान अस्पतालों, पृथक वार्डों, पृथक-वास केंद्रों, गृह पृथक-वास, नमूना केंद्रों और प्रयोगशालाओं से कोविड-19 जैवचिकित्सा कचरे को एकत्र करने, इसके परिवहन तथा निपटारे की सेवा उपलब्ध करा रहे हैं।’’
इसने कहा कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचना के अनुसार 2,907 अस्पताल, 20,707 पृथक-वास केंद्र, 1,539 नमूना केंद्र और 264 प्रयोगशालाएं कोविड-19 कचरा उत्पन्न करने में शामिल हैं।
हरित इकाई ने कहा कि कोविड-19 कचरे को साामन्य कचरे से अलग करना न सिर्फ जैवचिकित्सा कचरा शोधन एवं निपटान प्रतिष्ठानों पर भार कम करने के लिए आवश्यक है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले और अधिक प्रदूषण से बचने के लिए भी आवश्यक है।
अधिकरण ने कहा कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ आगे के समन्वय के लिए राज्यों के मुख्य सचिवों, राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों, स्वास्थ्य विभागों और केंद्रीय स्तर पर उच्चस्तरीय कार्य टीम को सतत निगरानी रखने की जरूरत है।
पीठ ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को 31 दिसंबर तक समेकित रिपोर्ट दायर करने का निर्देश दिया और कहा कि वह इस संबंध में दूरदर्शन, आकाशवाणी और अन्य मीडिया मंचों पर उचित कार्यक्रम चला सकता है।
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