देश की खबरें | खड़गे, सिद्धरमैया ने मुखर्जी के 2018 में आरएसएस कार्यक्रम में शामिल होने पर अफसोस जताया
एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

बेंगलुरु, एक सितंबर वरिष्ठ कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और सिद्धरमैया ने मंगलवार को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को श्रद्धांजलि देते हुए उनकी विद्वतता और राष्ट्र की लंबे समय तक सेवा की प्रशंसा की लेकिन 2018 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक समारोह में उनके शामिल होने पर अफसोस प्रकट किया।

भारत के 13वें राष्ट्रपति रहे मुखर्जी (84) का सोमवार को नयी दिल्ली स्थित सेना के एक अस्पताल में निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार मंगलवार को किया गया।

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कर्नाटक कांग्रेस द्वारा यहां आयोजित शोकसभा को संबोधित करते हुए खड़गे ने कहा, ‘‘मुझे केवल एक अफसोस है, यह उस बारे में बात करने का समय नहीं है, लेकिन फिर भी......ऐसे विद्वान (मुखर्जी) जिन्हें सारे विषय याद रहते थे और इतिहास, धर्म तथा राजनीति जैसे विषयों पर जिनका नियंत्रण था।’’

उन्होंने कहा, ‘‘ऐसे व्यक्ति जो विवादों का समाधान कर सकते थे और जिन्होंने आम-सहमति बना पाने की अपनी क्षमता के कारण करीब 50 मंत्रिसमूहों की अध्यक्षता की....वह अपने बाद के सालों में आरएसएस कार्यालय क्यों गये। मैं समझ नहीं सका।’’

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पूर्व केंद्रीय मंत्री खड़गे ने कहा कि उनके दिमाग में इस बारे में प्रश्न आता है क्योंकि मुखर्जी का विश्वास नेहरूवाद में था, वह इंदिरा गांधी के दर्शन को मानते थे।

उन्होंने कहा कि मुखर्जी के राजीव गांधी से मतभेद थे और वह करीब चार साल तक पार्टी से बाहर रहे, लेकिन उन्होंने वापसी की।

खड़गे ने कहा, ‘‘मेरे मन में यह सवाल था कि उनके जैसा विद्वान ऐसी जगह क्यों गया, लेकिन मुझे इस विषय पर उनसे आमने-सामने बात करने का अवसर नहीं मिला।’’

पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने भी इस विषय पर खड़गे की भावनाओं से सहमति जताई।

उन्होंने कहा, ‘‘जैसा कि खड़गे ने कहा, यह मेरे लिए अब भी सबसे बड़ा रहस्य है कि कांग्रेस में इतने लंबे समय तक रहने के बाद और राष्ट्रपति के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद उन्होंने संघ के शिविर में भाषण दिया, जिस संगठन ने महात्मा गांधी को मार डाला। मुझे अब भी समझ नहीं आता कि वह क्यों गये। मेरे निजी विचार से उन्हें वहां नहीं जाना चाहिए था।’’

संघ पर ‘सांप्रदायिक संगठन’ होने का आरोप लगाते हुए सिद्धरमैया ने कहा कि 50 साल के राजनीतिक जीवन और जिंदगी भर कांग्रेस से जुड़े रहने के बाद मुखर्जी का वहां जाना और भाषण देना दुखद रहा।

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