अहमदाबाद, 17 अक्टूबर केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रीजीजू ने सोमवार को कहा कि जिस प्रकार मीडिया पर निगरानी के लिए भारतीय प्रेस परिषद है, ठीक उसी प्रकार न्यायपालिका पर निगरानी की एक व्यवस्था होनी चाहिए और इसकी पहल खुद न्यायपालिका ही करे तो देश के लिए अच्छा होगा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ‘मुखपत्र’ माने जाने वाले ‘‘पांचजन्य’’ की ओर से यहां आयोजित ‘‘साबरमती संवाद’’ में यह बात कही गई। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में कार्यपालिका और विधायिका पर निगरानी की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन न्यायपालिका के भीतर ऐसा कोई तंत्र नहीं है।
न्यायिक सक्रियता (ज्यूडिशियल एक्टिविज्म) से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका अगर अपने-अपने दायरे में रहे और अपने काम में ही ध्यान लगाए तो फिर यह समस्या नहीं आएगी।
उन्होंने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि हमारे कार्यपालिका और विधायिका अपने दायरे में बिल्कुल बंधे हुए हैं। अगर वे इधर-उधर भटकते हैं तो न्यायपालिका उन्हें सुधारती है। समस्या यह है कि जब न्यायपालिका भटकती है, उसको सुधारने का व्यवस्था नहीं है।’’
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि वह न्यायपालिका को कोई आदेश नहीं दे सकते हैं, लेकिन उसे‘‘सतर्क’’ जरूर कर सकता हूं क्योंकि वह भी लोकतंत्र का हिस्सा है और लाइव स्ट्रीमिंग व सोशल मीडिया के जमाने में वह भी जनता की नजर में है।
उन्होंने कहा, ‘इसलिए आपका भी व्यवहार अनुकूल हो... जैसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाकियों का होता है। लोग आपको भी देख रहे हैं... आप अपने लिए सेल्फ रेगुलेटिंग मेकैनिज्म (स्व-विनियमन तंत्र) बनाएं तो यह देश के लिए अच्छा होगा।’’
उन्होंने उदाहरण दिया कि संसद का कोई सदस्य अगर आपत्तिजनक शब्दों या का इस्तेमाल करता है तो उस पर लगाम लगाने के प्रावधान हैं। इसी प्रकार प्रधानमंत्री से लेकर नीचे तक के लोग नियमों से बंधे होते हैं।
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