नयी दिल्ली, 11 अक्टूबर उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि समन जारी करना महज औपचारिकता भर नहीं है और मजिस्ट्रेट को आरोपी के खिलाफ कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार मौजूद होने का पता लगाने में अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए।
न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति सी.टी. रविकुमार ने एक फार्मास्यूटिकल्स कंपनी के निदेशकों के खिलाफ जारी समन को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
पीठ ने कहा, ‘‘समन जारी करना महज औपचारिकता भर नहीं है। मजिस्ट्रेट को इस बारे में अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए कि मामले में कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार हैं, या नहीं। इस तरह के विचार बनने को आदेश में उल्लेखित करने की जरूरत है।’’
न्यायालय ने कहा, ‘‘आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनने के निष्कर्ष तक पहुंचने में यदि कोई कारण नहीं बताया जाता है तो आदेश निरस्त किये जाने का हकदार है। नि:संदेह, आदेश में विस्तृत कारणों का उल्लेख किये जाने की जरूरत है।’’
पीठ ने कहा कि महज इसलिए कि एक व्यक्ति एक कंपनी का निदेशक है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह ‘औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम,1940 के तहत जरूरतों को पूरा करता है, जिससे कि उसे जिम्मेदार ठहराया जा सके।
न्यायालय ने कहा, ‘‘यह कहा गया है कि एक व्यक्ति को तब तक जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि वह प्रभारी ना हो और कंपनी के कामकाज के संचालन के लिए भी जिम्मेदार नहीं हो। ’’
पीठ ने कहा कि महज इसलिए कि एक व्यक्ति कंपनी का निदेशक है, यह जरूरी नहीं है कि वह कंपनी के दिन-प्रतिदिन के कामकाज से अवगत है।
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